Transliteration: (Wa maa 'allamnaahush shi'ra wa maa yambaghee lah; in huwa illaa zikrunw-wa Qur-aanum mubeen)
"और हमने उन्हें शे'र नहीं सिखाया और न ही यह उनकी शान के शायाने शान है [102]; यह तो सिर्फ़ एक नसीहत और रौशन क़ुरआन है [103],"
काफ़िर हुज़ूर अकरम ﷺ पर तोहमत लगाते थे कि (मआज़ल्लाह) आप शायर हैं। अल्लाह तआला ने उनकी इस तोहमत को रद्द फ़रमाया कि शायरी ख्याली बातों, मुबालग़ा-आराई और तख़य्युलाती फ़साने पर मबनी होती है, जबकि नबी की ज़बाने अक़दस से सिर्फ़ हक़, सच्चाई और वही-ए-इलाही जारी होती है।
हुज़ूर ﷺ को शायरी से महफ़ूज़ रखना आपकी अज़ीम शान की अज़मत का इज़हार है, हालांकि आप कलाम के तमाम फ़ुनून से ब-दर्जा-ए-कमाल वाक़िफ़ थे।
क़ुरआने मजीद शायरी नहीं बल्कि सरापा हिदायत, रब्बानी नसीहत और हक़-ओ-बातिल में फ़र्क़ करने वाली रौशन किताब है। अगर इसमें कहीं वज़न या क़ाफ़िया महसूस हो, तो वह कलाम-ए-इलाही की कु़दरती फ़साहत और मिठास है, न कि इंसानी शायरी के क़वाइद।
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