कुरान - 36:77 सूरह या-सीन अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

77
أَوَلَمۡ يَرَ ٱلۡإِنسَٰنُ أَنَّا خَلَقۡنَٰهُ مِن نُّطۡفَةٖ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٞ مُّبِينٞ

Transliteration: (Awalam yaral insaanu annaa khalaqnaahu min nutfatin fa-izaa huwa khaseemum mubeen)

और क्या इंसान ने नहीं देखा कि हमने उसे नुत्फ़े (पानी की बूँद) से पैदा किया, फिर वह अचानक खुला झगड़ालू बन बैठा [114]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह या-सीन आयत 77 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह या-सीन तफ़सीर - आयत 77

"और क्या इंसान ने नहीं देखा कि हमने उसे नुत्फ़े से पैदा किया, फिर वह अचानक खुला झगड़ालू बन बैठा [114]?"

[114] हक़ीर नुत्फ़े से पैदाइश और इंसान की सरकशी

उबई बिन ख़लफ़ या आस बिन वायल जैसे काफ़िरों ने बोसीदा हड्डियां लाकर हुज़ूर ﷺ के सामने चूरा कीं और कहा कि क्या अल्लाह इन्हें दोबारा ज़िंदा करेगा? अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि इंसान अपनी हक़ीक़त भूल गया कि वह एक हक़ीर और गंदी बूंद से पैदा हुआ था। जिस ख़ुदा ने उस बूंद को जीता-जागता, बोलने और बहस करने वाला इंसान बना दिया, क्या वह उसे दोबारा ज़िंदा नहीं कर सकता?

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