Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanut taqul laaha wa qooloo qawlan sadeedaa)
"ऐ ईमान वालो! अल्लाह से डरो और बिल्कुल सीधी व सच्ची बात कहा करो [195];"
यह आयत-ए-मुबारका तालीम देती है कि हक़ीक़ी तक़वा सिर्फ़ अल्लाह के ख़ौफ़ ही का नाम नहीं, बल्कि उसमें गुफ़्तगू का अदब और ज़बान की पाबंदी भी शामिल है।
तक़वा के हुक्म के फ़ौरन बाद सच्ची और सीधी बात कहने का हुक्म यह साबित करता है कि ज़बान को क़ाबू में रखना इंतिहाई अहम है—इतना अहम कि अगरचे यह तक़वा ही का हिस्सा था, मगर अल्लाह तआला ने इसकी अज़मत ज़ाहिर फ़रमाने के लिए इसे अलग से बयान फ़रमाया।
ज़बान को झूठ, ग़ीबत, बोहतान, गाली-गलौज और चुग़लख़ोरी से बचाना तमाम नेकियों की बुनियाद है।
जिस्म के दूसरे आज़ा के बरअक्स, जहाँ एक बीमारी दो अंगों को मुतास्सिर कर सकती है, ज़बान एक अकेला अंग है, मगर इसका नुक़सान बेहद वसीअ है। यह होंठों और दांतों के मज़बूत हिसार में बंद है, जो हमें यह सबक़ देता है कि इसे हमेशा क़ाबू में और हिफ़ाज़त से रखना चाहिए।
पैग़ाम बिल्कुल वाज़ेह है: बे-लगाम ज़बान इंसान की नेकियों को बर्बाद कर देती है, जबकि सच्ची ज़बान अल्लाह के सच्चे ख़ौफ़ की पहचान है।
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