Transliteration: (Yuslih lakum a'maalakum wa yaghfir lakum zunoobakum; wa mai yuti'il laaha wa Rasoolahoo faqad faaza fawzan 'azeemaa)
"वह तुम्हारे लिए तुम्हारे आमाल दुरुस्त फ़रमा देगा [196] और तुम्हारे गुनाहों को बख़्श देगा; और जो कोई अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमांबरदारी करे उसने बड़ी कामयाबी हासिल कर ली [197]।"
इस आयत में यह वादा फ़रमाया गया है कि अगर तुम अल्लाह से डरोगे और सीधी बात कहोगे, तो अल्लाह तआला:
तुम्हारे आमाल को संवार देगा
तुम्हारे गुनाहों को मुआफ़ फ़रमा देगा
जब बंदा फ़राइज़ की पाबंदी पर क़ायम रहता है, तो अल्लाह तआला उसे मज़ीद तौफ़ीक़ अता फ़रमाता है—पहले सुन्नतों की पाबंदी की तरफ़, और फिर नफ़्ल इबादात की तरफ़।
इस तरह नेकियों में दर्जा-ब-दर्जा तरक़्क़ी के ज़रिए इंसान गुनाहों से महफ़ूज़ हो जाता है। अलबत्ता हिदायत और सवाब के दरजात हर शख़्स के ख़ुलूस और मुस्तक़िल मिज़ाजी के ऐतबार से अलग-अलग होते हैं।
आयत का यह हिस्सा हक़ीक़ी कामयाबी की तारीफ़ बयान करता है:
अल्लाह और उसके रसूल ﷺ की इताअत ही इंसान को दाइमी और लाज़वाल कामयाबी तक पहुंचाती है—न कि माल, दौलत, ओहदा या दुनियावी ताक़त।
यह आयत तस्दीक़ करती है कि कामयाब ज़िंदगी वही है जो अल्लाह और उसके हबीब ﷺ की ख़िदमत और फ़रमांबरदारी में बसर हो। ऐसी ज़िंदगी दुनिया की भलाई और आख़िरत की हमेशा रहने वाली नेमतों दोनों की ज़ामिन है।
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