Transliteration: (Innaa 'aradnal amaanata 'alas samaawaati walardi wal jibaali fa abaina ai yahmil nahaa wa ashfaqna minhaa wa hamalahal insaanu innahoo kaana zalooman jahoolaa)
"बेशक हमने इस अमानत [198] को आसमानों, ज़मीन और पहाड़ों के सामने पेश किया, तो उन्होंने उसके उठाने से इनकार किया [199] और उससे डर गए [200], और इंसान ने उसे उठा लिया [201]; बेशक वह अपनी जान पर बड़ा ज़ुल्म करने वाला, निहायत नादान [202] साबित हुआ।"
यहाँ अमानत से मुराद तमाम शरई तकालीफ़ और दीनी ज़िम्मेदारियाँ हैं—इबादात, अहकाम, मुमानआत, मामलात और वे तमाम फ़राइज़ जो इंसान पर आयद किए गए हैं।
बाज़ मुफ़स्सिरीन ने इससे इश्क़-ए-इलाही की आग भी मुराद ली है, जो मख़लूक़ को अपने मालिक की बंदगी पर उभारती है। अगरचे तमाम मख़लूक़ात अल्लाह की तस्बीह करती हैं, मगर वे फ़ितरी (कुदरती) तौर पर ऐसा करती हैं, किसी शरई तकलीफ़ के तहत नहीं। लिहाज़ा उनकी इबादत इस अमानत-ए-तकलीफ़िया में शामिल नहीं।
सिर्फ़ इंसान और जिन्नात को इख़्तियार दिया गया जिस पर सवाब और अज़ाब का दारोमदार है—यही बात इस अमानत के बोझ को पुर-वक़ार बनाती है।
आसमानों, ज़मीन और पहाड़ों ने इस अमानत को तकब्बुर की वजह से नहीं ठुकराया, बल्कि इंतिहाई आज़िज़ी और ख़ौफ़ की वजह से उज़्र पेश किया, यह जानते हुए कि अगर इसका हक़ अदा न हुआ तो वे उसके नतीजों को बर्दाश्त न कर सकेंगे।
चूंकि अमानत उठाना उन पर फ़र्ज़ नहीं किया गया था बल्कि इख़्तियार पेश किया गया था, लिहाज़ा उन्होंने अदब से उज़्र-ख़्वाही की और इनकार कर दिया।
उन्हें यह ख़ौफ़ था कि इस अमानत का हक़ अदा न करने पर अज़ाब का सामना करना पड़ेगा। चुनांचे उन्होंने अर्ज़ किया: “हम ऐसा बोझ नहीं उठाना चाहते जिसमें सवाब तो है मगर नाफ़रमानी पर अज़ाब का ख़तरा भी है।”
जब यह अमानत हज़रत आदम (अलैहिस्सलाम) के सामने पेश की गई, तो आपने उसे ब-ख़ुशी क़बूल फ़रमा लिया। इस तरह इंसान इस अज़ीम ज़िम्मेदारी का हामिल बन गया, बावजूद इसके कि वह उन अज़ीम मख़लूक़ात के मुक़ाबले में कमज़ोर तरीन था।
यह इंसान की क़ुव्वत-ए-इख़्तियार, और उस शर्फ़ व ख़तरे को ज़ाहिर करता है जो इस अमानत के साथ जुड़ा हुआ है।
ये अल्फ़ाज़—"ज़लूम" (बड़ा ज़ुल्म करने वाला) और "जहूल" (निहायत नादान)—यहाँ मलामत के तौर पर नहीं, बल्कि मुहब्बत और शफ़क़त के तौर पर भी समझे जा सकते हैं, जैसे किसी बहादुर को प्यार से “बे-जिगर” या “दीवाना” कह दिया जाए।
गोया अल्लाह तआला मुहब्बत से फ़रमाता है कि इंसान ने अपनी कमज़ोरी के बावजूद कितनी हिम्मत से वह बोझ उठा लिया जिसे इतनी बड़ी-बड़ी मख़लूक़ात उठाने से डर गईं।
दूसरी तफ़्सीर यह है कि ये सिफ़ात उन लोगों के लिए हैं जिन्होंने अमानत में ख़ियानत की—यानी काफ़िर और मुनाफ़िक़, जैसा कि अगली आयत में ज़िक्र है। उस सूरत में यह आयत अपनी आज़ादी और ज़िम्मेदारियों का ग़लत इस्तेमाल करने वालों की मज़म्मत करती है।
इस आयत से मुराद ख़िलाफ़त नहीं है (जो हज़रत आदम को पहले ही अता हो चुकी थी), बल्कि यह अख़लाक़ी और रूहानी तकलीफ़ की ज़िम्मेदारी है जो इंसान की ख़ास पहचान है।
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