Transliteration: (Yaaa aiyuhal lazeena aamanuz kuroo ni'matal laahi 'alaikum iz jaaa'atkum junoodun fa arsalnaa 'alaihim reehanw wa junoodal lam tarawhaa; wa kaanal laahu bimaa ta'maloona Baseera)
"ऐ ईमान वालो! अपने ऊपर अल्लाह की उस नेमत को याद करो [21] जब तुम्हारे मुक़ाबले में (दुश्मनों के) लश्कर चढ़ आए, तो हमने उन पर तेज़ आंधी और ऐसे लश्कर [22] (फ़रिश्ते) भेज दिए जिन्हें तुमने नहीं देखा; और अल्लाह तुम्हारे आमाल को ख़ूब देख रहा है।"
इससे मुराद ग़ज़्वा-ए-अहज़ाब (जंगे ख़ंदक़) है, जो जंगे उहुद के एक साल बाद वाक़े हुई। मोमिनीन को मुत्तहिदा लश्करों और दुश्मनों ने चारों तरफ़ से घेर लिया था। उस नाज़ुक तरीन वक़्त में अल्लाह तआला का एहसान-ए-अज़ीम गै़बी नुसरत व मदद की सूरत में ज़ाहिर हुआ, जिसने मुसलमानों को उस शिकस्त से बचा लिया जो ज़ाहिरी अस्बाब के लिहाज़ से यक़ीनी नज़र आ रही थी।
यह दुश्मनों का वह मुत्तहिदा लश्कर (अहज़ाब) था जिसमें क़ुरैश, बनू गतफ़ान, यहूदे बनू क़ुरैज़ा, बनू नज़ीर और दीगर मुशरिकीन व अहले किताब शामिल थे। जब उन्होंने मदीना मुनव्वरा का मुहासिरा कर लिया, तो अल्लाह तआला ने उन पर सर्द व तेज़ आंधी और फ़रिश्तों का लश्कर भेजा—जिन्हें इंसानी आँखें नहीं देख सकती थीं—जिसने दुश्मन की सफ़ों में खलबली मचा दी और उन्हें मैदान छोड़कर भागने पर मजबूर कर दिया। यह आयत याद दिलाती है कि अल्लाह मोमिनों के आमाल को हमेशा देख रहा है, और उसकी नुसरत मुश्किल तरीन लम्हात में नाज़िल होती है।
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