कुरान - 6:131 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

131
ذَٰلِكَ أَن لَّمۡ يَكُن رَّبُّكَ مُهۡلِكَ ٱلۡقُرَىٰ بِظُلۡمٖ وَأَهۡلُهَا غَٰفِلُونَ

Transliteration: (Zaalika al lam yakkur Rabbuka muhlikal quraa bizulminw wa ahluhaa ghaafiloon)

यह इसलिए है कि तुम्हारा रब कभी बस्तियों को नाहक़ [291] हलाक़ नहीं करता, जबकि उनके लोग बे-ख़बर [292] हों। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 131 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 131 की तफ़्सीर

✅ [291] अज़ाब से पहले अल्लाह का इंसाफ़

यह आयत बताती है कि अल्लाह बिना इंसाफ़ के अज़ाब नहीं देता।
क़ियामत के दिन हिसाब-किताब अल्लाह की नाउज़ुबिल्लाह जाहिलियत की वजह से नहीं, बल्कि गुनाहों को सबूत के तौर पर सामने लाने के लिए होगा।
दुनिया में भी सज़ा बिना मुक़दमे के नहीं दी जाती, ऐसे ही आख़िरत में हर गुनहगार को उसके आमाल दिखाए जाएंगे, ताकि अज़ाब बिल्कुल बरहक़ हो।

✅ [292] इलाही अज़ाब के दो असूल

अल्लाह तब तक अज़ाब नहीं भेजता जब तक लोग खुला गुनाह न करें।
जिन लोगों तक पैग़म्बरी दावत नहीं पहुँची, उन पर अज़ाब नहीं होगा।
इसका मतलब यह है कि मशरिक़ों के नाबालिग़ बच्चे, नबी ﷺ के वालिदैन, और जो लोग इस्लाम की तबलीग़ से पहले तौहीद पर मर गए — उन्हें जहन्नम में नहीं डाला जाएगा।
पैग़म्बर या नेक बंदों पर आने वाली मुसीबतें या बच्चों की मौत — ये अज़ाब नहीं बल्कि रहमत हैं।
यही उसूल दुनिया और आख़िरत दोनों में अल्लाह की हिकमत और इंसाफ़ को साबित करते हैं।

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