Transliteration: (Zaalika al lam yakkur Rabbuka muhlikal quraa bizulminw wa ahluhaa ghaafiloon)
यह आयत बताती है कि अल्लाह बिना इंसाफ़ के अज़ाब नहीं देता।
क़ियामत के दिन हिसाब-किताब अल्लाह की नाउज़ुबिल्लाह जाहिलियत की वजह से नहीं, बल्कि गुनाहों को सबूत के तौर पर सामने लाने के लिए होगा।
दुनिया में भी सज़ा बिना मुक़दमे के नहीं दी जाती, ऐसे ही आख़िरत में हर गुनहगार को उसके आमाल दिखाए जाएंगे, ताकि अज़ाब बिल्कुल बरहक़ हो।
अल्लाह तब तक अज़ाब नहीं भेजता जब तक लोग खुला गुनाह न करें।
जिन लोगों तक पैग़म्बरी दावत नहीं पहुँची, उन पर अज़ाब नहीं होगा।
इसका मतलब यह है कि मशरिक़ों के नाबालिग़ बच्चे, नबी ﷺ के वालिदैन, और जो लोग इस्लाम की तबलीग़ से पहले तौहीद पर मर गए — उन्हें जहन्नम में नहीं डाला जाएगा।
पैग़म्बर या नेक बंदों पर आने वाली मुसीबतें या बच्चों की मौत — ये अज़ाब नहीं बल्कि रहमत हैं।
यही उसूल दुनिया और आख़िरत दोनों में अल्लाह की हिकमत और इंसाफ़ को साबित करते हैं।
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