Transliteration: (Wa ja'aloo lillaahi mimmaa zara-a minal harsi walan'aami naseeban faqaaloo haazaa lillaahi biza'mihim wa haaza lishurakaa'inaa famaa kaana lishurakaaa'ihim falaa yasilu ilal laahi wa maa kaana lillaahi fahuwa yasilu ilaa shurakaaa'ihim; saaa'a maa yahkumoon)
यह आयत उन मुशरिक़ों की बुनियादहीन रस्म की नफ़ी करती है, जिन्होंने अपनी पैदावार और मवेशी का हिस्सा बाँट लिया – कुछ अल्लाह के नाम पर और कुछ अपने बुतों के नाम पर।
कुरआन ने इसे “उनकी ख़्वाहिश” कहा, यानी ऐसा अमल जिसका अल्लाह ने हुक्म नहीं दिया, बल्कि यह रद्द और बेकार है।
मुशरिक़ लोग अल्लाह के हिस्से को मेहमानों और ग़रीबों के लिए रखते और बुतों के हिस्से को अपने लिए।
अगर कभी अल्लाह का हिस्सा ग़लती से बुतों को मिल जाता, तो वह उसे वहीं छोड़ देते, लेकिन अगर बुतों का हिस्सा अल्लाह की तरफ़ चला जाता तो उसे रोक लेते।
यह उनकी नाइंसाफ़ी और दोग़लापन था, जो उनकी रूहानी गिरावट को दिखाता है।
अल्लाह ने उनके इस अमल पर ग़ज़ब का इज़हार किया, मगर उनकी पैदावार को हराम क़रार नहीं दिया।
असल में शिर्क उनका हिस्सों को बुतों के नाम पर करना था, न कि खोराक़ या जानवर ख़ुद।
अगर वही जानवर अल्लाह के नाम पर ज़बह किए जाएँ, तो वह हلال और पाक हो जाते हैं।
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