Transliteration: (Wa kazaalika zaiyana likaseerim minal mushrikeena qatla awlaadihim shurakaaa'uhum liyurdoohum wa liyalbisoo 'alaihim deenahum wa law shaaa'al laahu maa fa'aloohu fazarhum wa maa yaftaroon)
मुशरिक़ लोग अपनी औलाद का क़त्ल करते – ख़ासकर बेटियों को ज़िंदा दफ़्न कर देते।
कभी-कभी बेटों को भी बुतों की नज़र के तौर पर क़ुर्बान कर देते।
यह सब अमल उन्होंने अपने झूठे बुतों और रहनुमाओं की पैरवी में किया, और उन्हें यही नेकी समझाया गया।
अरब मूल रूप से हज़रत इस्माईल (अ) की तौहीदी राह पर थे, मगर शैतान ने धीरे-धीरे उन्हें गुमराह कर दिया।
यहाँ तक कि उन्होंने शिर्क और औलाद क़त्ल जैसी बुरी बातों को भी दीन का हिस्सा समझ लिया।
यानी असल दीन में शैतानी मिलावट कर दी गई।
आयत का मतलब यह नहीं कि अल्लाह इन कामों से राज़ी था, बल्कि यह कि उसने अपनी आम मशीयत के तहत उन्हें करने दिया।
अल्लाह की रज़ा (पसंद) हमेशा नेकियों से होती है, बुराइयों से नहीं।
इसलिए इसमें कोई तज़ाद नहीं है।
अल्लाह ने फ़रमाया कि उन्हें उनके हाल पर छोड़ दो –
यानी उनकी गुमराही से ग़मगीन या मायूस न हो, और न ही उनकी नक़ल करो।
लेकिन इसका मतलब तबलीग़ छोड़ना नहीं है, बल्कि उनकी बनावटी बातों से दिली दूरी बनाना है।
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