कुरान - 21:67 सूरह अल-अंबिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

67
أُفّٖ لَّكُمۡ وَلِمَا تَعۡبُدُونَ مِن دُونِ ٱللَّهِۚ أَفَلَا تَعۡقِلُونَ

Transliteration: (Uffil lakum wa limaa ta'budoona min doonil laah; afalaa ta'qiloon)

67. 'तुफ़ (लानत व अफ़सोस) है तुम पर और उन पर जिनकी तुम अल्लाह के सिवा पूजा करते हो! तो क्या तुम बिल्कुल अक़्ल से काम नहीं लेते [98]?' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अंबिया आयत 67 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-अंबिया — आयत 67 की तफ़सीर

"'तुफ़ (लानत व अफ़सोस) है तुम पर और उन पर जिनकी तुम अल्लाह के सिवा पूजा करते हो! तो क्या तुम बिल्कुल अक़्ल से काम नहीं लेते [98]?'"

[98] बातिल के ख़िलाफ़ अंबिया का सख्त मौक़िफ़

हज़रत इब्राहीम (अलैहिस्सलाम) ने सख्त अल्फ़ाज़ में मुशरिकों और उनके बातिल माबूदों पर तन्क़ीद फ़रमाई। इससे मालूम हुआ कि दीने हक़ की हिफ़ाज़त और कुफ़्र व शिर्क के बुतलान के लिए मुशरिक़ीन के झूठे अक़ीदों पर सख़्ती से निकार करना अंबिया-ए-किराम की सुन्नत है। हज़रत इब्राहीम ने पूरी क़ौम और बादशाह के मुक़ाबले में अकेले खड़े होकर यह कलिमा-ए-हक़ बुलन्द फ़रमाया।

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