Transliteration: (Fafahhamnaahaa sulaimaan; wa kullan aatainaa hukmanw wa'ilmanw wa sakh kharnaa ma'a Daawoodal jibaala yusabbihna wattayr; wa kunnaa faa'ileen)
"पस हमने वह फ़ैसला सुलैमान को समझा दिया [115]; और हमने दोनों को हिकमत और इल्म अता फ़रमाया था [116]; और हमने दाऊद के साथ पहाड़ों और परिंदों को ताबेअ कर दिया था [117] जो (अल्लाह की) तस्बीह करते थे; और हम ही (यह सब) करने वाले थे।"
हज़रत सुलैमान ने अर्ज़ किया कि ऐ अल्लाह के नबी, इससे बेहतर फ़ैसला यह है कि बकरियाँ आरज़ी (temporary) तौर पर खेत वाले को दी जाएं ताकि वह उनके दूध, ऊन और बच्चों से फ़ायदा उठाए; और खेत बकरी वाले के हवाले किया जाए ताकि वह उसमें मेहनत करके उसे दोबारा उसी हालत में पहुंचा दे जैसी वह नुक़्सान से पहले थी। जब खेत तैयार हो जाए तो वह खेत वाले को वापस कर दिया जाए और बकरियाँ उनके मालिक को मिल जाएं। हज़रत दाऊद ने इस फ़ैसले को बेहद पसंद फ़रमाया और इसी पर अमल कराया।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि हमने दोनों को हिकमत और इल्म अता किया था। इससे मालूम हुआ कि हज़रत दाऊद का फ़ैसला भी उनके इज्तिहाद के मुताबिक़ बरहक़ था और हज़रत सुलैमान का फ़ैसला भी। शरीअत में मुजतहिद से अगर खता-ए-इज्तिहादी हो जाए तब भी वह सवाब का मुस्तहिक़ होता है।
अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद (अलैहिस्सलाम) को ऐसा पुर-सोज़ और दिलकश लहना अता फ़रमाया था कि जब वे ज़बूर शरीफ़ की तिलावत फ़रमाते, तो हवा में उड़ते हुए परिंदे ठहर जाते और पहाड़ों की चट्टानें उनके साथ मिलकर अल्लाह की हम्दो-तस्बीह में गूंज उठती थीं।
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