Transliteration: (Wa Zan Nooni iz zahaba mughaadiban fa zannaa al lan naqdira 'alaihi fanaadaa fiz zulumaati al laaa ilaaha illaaa Anta Subhaanaka innee kuntu minaz zaalimeen)
"और मछली वाले (यूनुस अलैहिस्सलाम) को (याद कीजिए) [130] जब वे (अपनी क़ौम से) ग़ुस्से में चल दिए [131] और समझे कि हम उन पर तंगी न करेंगे [132]; फिर उन्होंने अंधेरों में (पुकार कर) दुआ की [133]: 'तेरे सिवा कोई माबूद नहीं, तू पाक है! बेशक मैं ही कुसूरवारों (ज़ालिमों) में से था [134] ।'"
हज़रत यूनुस (अलैहिस्सलाम) को मोसल (इराक़) की बस्ती नैनवा की तरफ़ भेजा गया था। मछली के पेट में रहने के सबब आपको 'ज़ुन्नून' (मछली वाले) का लक़ब अता हुआ।
जब क़ौम ने लम्बे अरसे तक दावत के बावजूद कुफ़्र न छोड़ा, तो हज़रत यूनुस रंज व ग़ुस्से में आकर बस्ती से बाहर चले गए। यह ग़ुस्सा नफ़्स के लिए नहीं बल्कि अल्लाह के दीन की ख़ातिर था।
हज़रत यूनुस का गुमान था कि अल्लाह उन पर इस रुख़्सत की वजह से कोई पकड़ न फ़रमाएगा, मगर अंबिया का मक़ाम निहायत नाज़ुक होता है; उन्हें हुक्मे इलाही के बग़ैर हिजरत न करनी चाहिए थी। चुनांचे कश्ती में क़ुरआ अंदाज़ी के बाद उन्हें समन्दर में डाला गया और एक अज़ीम मछली ने उन्हें निगल लिया।
हज़रत यूनुस ने तीन अंधेरों (रात का अंधेरा, समन्दर की गहराइयों का अंधेरा और मछली के पेट का अंधेरा) में अपने रब को पुकारा।
आपने यह कलिमात पढ़े: 'ला इलाहा इल्ला अन्ता सुब्हानका इन्नी कुन्तु मिनज़-ज़ालिमीन'। यहाँ 'ज़ालिम' का लफ़्ज़ गुनाह के मफ़हूम में नहीं बल्कि अपनी शान के मुक़ाबले में अदना तर्के औला पर आजिज़ी व इन्केसारी के इज़हार के लिए है। यह दुआ हर मुसीबत और परेशानी से निजात के लिए निहायत मुजर्रब वज़ीफ़ा है।
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