कुरान - 25:60 सूरह अल-फुरक़ान अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

60
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱسۡجُدُواْۤ لِلرَّحۡمَٰنِ قَالُواْ وَمَا ٱلرَّحۡمَٰنُ أَنَسۡجُدُ لِمَا تَأۡمُرُنَا وَزَادَهُمۡ نُفُورٗا۩

Transliteration: (Wa izaa qeela lahumus judoo lir Rahmaani qaaloo wa mar Rahmaanu 'a nasjudu limaa ta'murunaa wa zaadahum nufooraa (section 5) (make sajda))

और जब उनसे कहा जाता है कि 'रहमान को सज्दा करो [107]', तो वे कहते हैं, 'रहमान क्या है? क्या हम उसे सज्दा करें जिसका तुम हमें हुक्म देते हो?' और इस (हुक्म) ने उनकी नफ़रत को और ज़्यादा बढ़ा दिया [108]। (सजदा) (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-फुरक़ान आयत 60 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अल-फ़ुरक़ान – आयत 60

"और जब उनसे कहा जाता है कि 'रहमान को सज्दा करो [107]', तो कहते हैं, 'रहमान क्या है? क्या हम उसे सज्दा करें जिसका तुम हुक्म देते हो?' और इस हुक्म ने नफ़रत को बढ़ा दिया [108]।"

[107] रहमान के लिए सजदे का हुक्म (आयत-ए-सजदा)

जब मुशरिकीन से कहा जाता कि सिर्फ़ अल्लाह रहमान की इबादत करो और उसके आगे अपनी पेशानी झुकाओ, तो वे तकब्बुर और हठधर्मी से कहते कि 'रहमान क्या चीज़ है? हम तो उसे नहीं जानते।' वे अल्लाह के इस सिफ़ाती नाम 'रहमान' का इंकार करते थे। यह आयत तिलावत करने और सुनने पर सजदा-ए-तिलावत वाजिब होता है।

[108] हक़ की दावत पर नफ़रत और गुरेज़ में इज़ाफ़ा

बजाय इसके कि वे रब्बे-रहमान के आगे सर-ब-सुजूद होते, वे और ज़्यादा बिदक गए और उनकी नफ़रत और सरकशी में इज़ाफ़ा हो गया। ईमान वालों को चाहिए कि इस आयत पर फ़ौरन सजदा-ए-शुक्र व इबादत अदा करें।

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