कुरान - 15:3 सूरह अल-हिज्र अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
ذَرۡهُمۡ يَأۡكُلُواْ وَيَتَمَتَّعُواْ وَيُلۡهِهِمُ ٱلۡأَمَلُۖ فَسَوۡفَ يَعۡلَمُونَ

Transliteration: (Zarhum yaakuloo wa yatamatta'oo wa yulhihimul amalu fasawfa ya'lamoon)

उन्हें छोड़ दो [3] कि वे खाएँ [4] और नफ़ा उठाएँ और झूठी उम्मीद उन्हें खेल में डाले रखे, तो अब जल्द जान जाएँगे [5]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-हिज्र आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-हिज्र – आयत 3 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

उन्हें छोड़ दो [3] कि वे खाएँ [4] और नफ़ा उठाएँ और झूठी उम्मीद उन्हें खेल में डाले रखे, तो अब जल्द जान जाएँगे [5]।

[3] काफ़िरों के मुताल्लिक़ हिदायत

इसका मतलब यह है कि उन पर अफ़सोस न करें और न उनकी फ़िक्र में घुलें। जब तक वे काफ़िर हैं, उन्हें सुअर खाने या शराब पीने से ज़बरदस्ती न रोकें; लेकिन इसका यह मतलब हरगिज़ नहीं कि उन्हें इस्लाम की दावत न दी जाए। चुनाँचे यह आयत महफ़ूज़ (मुहकम) है और मंसूख़ नहीं है।

[4] अमली मामलात में काफ़िरों की आज़ादी

यहाँ एक अहम मसले की तरफ़ इशारा है कि काफ़िर फ़ुरू-ए-शरीअत (इस्लामी अहकाम) के पाबंद नहीं हैं। वे अपनी मर्ज़ी से हलाल या हराम चीज़ें खा सकते हैं या अपने तरीक़े पर अमल कर सकते हैं; इस्लामी हुक्मरानों को उनके ज़ाती तौर-तरीक़ों में दख़ल नहीं देना चाहिए। अलबत्ता समाजी मामलात अलग हैं — चुनाँचे किसी काफ़िर को भी चोरी आदि जुर्म करने से रोका जाएगा।

[5] मौत के वक़्त हक़ीक़त का खुलना

मौत के वक़्त इंसान पर हक़ीक़त आशकार हो जाती है। लंबी उम्मीदें और ग़फ़लत की आरज़ूएं मोमिन की शान के ख़िलाफ़ हैं। काफ़िर का ग़फ़लत से खाना-पीना भी नापसंदीदा अमल है, जबकि नेक मोमिनों की नींद भी इबादत शुमार होती है।

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