Transliteration: (Yamunnoona 'alaika an aslamoo qul laa tamunnoo 'alaiya Islaamakum balillaahu yamunnu 'alaikum an hadaakum lil eemaani in kuntum saadiqeen)
"(ऐ प्यारे रसूल!) वे आप पर एहसान जताते हैं कि वे इस्लाम ले आए हैं! आप फ़रमा दीजिए: 'मुझ पर अपने इस्लाम का एहसान न जताओ [50]! बल्कि अल्लाह ने तुम पर एहसान किया है कि उसने तुम्हें ईमान की हिदायत दी [51], अगर तुम (अपने दावे में) सच्चे हो!'"
कुछ देहातियों ने हुज़ूर ﷺ से कहा कि देखिए हम बिना लड़े आपके पास मुसलमान होकर आ गए, इसलिए हमारे साथ ख़ास सुलूक किया जाए। अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि हुज़ूर ﷺ पर किसी मख़लूक़ का कोई एहसान नहीं हो सकता।
जिस तरह कोई रिआया (प्रजा) बादशाह की सेवा करके बादशाह पर एहसान नहीं जता सकती, उसी तरह किसी इंसान का इस्लाम क़बूल करना रसूलुल्लाह ﷺ पर एहसान नहीं बल्कि ख़ुद उस इंसान की अपनी नजात का ज़रिया है।
कायनात की तमाम नेमतें—हिदायत, रहमत और ईमान—हमें हुज़ूर अकरम ﷺ के मुबारक वसीले से मिली हैं। पूरी कायनात हुज़ूर ﷺ की एहसानमंद है, हुज़ूर ﷺ किसी के एहसानमंद नहीं।
जैसे सूरज से रौशनी लेने पर सूरज का कोई फ़ायदा नहीं होता बल्कि रौशनी पाने वाले का फ़ायदा होता है; अगर सारी दुनिया भी काफ़िर हो जाए तो हुज़ूर ﷺ की शान में ज़र्रा बराबर कमी नहीं आ सकती, और अगर सब मुसलमान हो जाएँ तो वे ख़ुद ही अपनी आक़िबत सँवारेंगे। कुरआन ने नबी-ए-करीम ﷺ के तशरीफ़ लाने को मोमिनों पर अल्लाह का सबसे अज़ीम एहसान फ़रमाया (सूरह आले इमरान, 3:164)।
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