कुरान - 17:15 सूरह अल-इस्रा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

15
مَّنِ ٱهۡتَدَىٰ فَإِنَّمَا يَهۡتَدِي لِنَفۡسِهِۦۖ وَمَن ضَلَّ فَإِنَّمَا يَضِلُّ عَلَيۡهَاۚ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٞ وِزۡرَ أُخۡرَىٰۗ وَمَا كُنَّا مُعَذِّبِينَ حَتَّىٰ نَبۡعَثَ رَسُولٗا

Transliteration: (Manihtadaa fa innamaa yahtadee linafsihee wa man dalla fa innamaa yadillu 'alaihaa; wa laa taziru waaziratunw wizra ukhraa; wa maa kunnaa mu'azzibeena hatta nab'asa Rasoola)

जो राह पर आया [40] वह अपने ही भले के लिए राह पर आता है, और जो भटका तो अपने ही बुरे (नुक़सान) को भटकता है। और कोई बोझ उठाने वाली जान दूसरे का बोझ न उठाएगी [41]। और हम अज़ाब देने वाले नहीं जब तक कि कोई रसूल न भेज दें [42]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-इस्रा आयत 15 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह बनी इस्राईल – आयत 15 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"जो राह पर आया [40] वह अपने ही भले के लिए राह पर आता है, और जो भटका तो अपने ही बुरे को भटकता है। और कोई बोझ उठाने वाली जान दूसरे का बोझ न उठाएगी [41]। और हम अज़ाब देने वाले नहीं जब तक कि कोई रसूल न भेज दें [42]।"

[40] हिदायत का फ़ायदा ख़ुद चलने वाले को मिलता है

इस आयत का मक़सद हमें यह आगाह करना है कि इन्सान को अपनी हिदायत और नेक आमाल का सवाब यक़ीनी तौर पर मिलेगा। ऐसा हरगिज़ नहीं होगा कि नेकी तो वह करे, मगर उसे महरूम करके उसका सवाब किसी दूसरे को दे दिया जाए।

अलबत्ता उसकी नेकियों के सवाब से दूसरे लोग भी फ़ायदा हासिल कर सकते हैं। चुनाँचे यह आयत ईसाल-ए-सवाब (अपनी नेकियों का सवाब बुज़ुर्गों व मरहूमीन को बख़्शने) के ख़िलाफ़ नहीं है और न ही अहादीस-ए-सहीहा के मुनाफ़ी है।

जैसा कि अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और उन दोनों (यतीम बच्चों) का बाप नेक आदमी था" (सूरह कहफ़ 18:82) — जहाँ बाप की नेकी का फ़ायदा औलाद को मिला।

इसके अलावा किसी को अपनी नेकियों और इबादत का एहसान अल्लाह या रसूल पर नहीं जताना चाहिए, क्योंकि वह जो कुछ भी नेकी करता है अपने ही नफ़े के लिए करता है।

[41] हर जान अपने ही गुनाह की ज़िम्मेदार है

यानी किसी बेगुनाह पर दूसरे के गुनाह का बोझ डालकर गुनहगार को बरी नहीं किया जाएगा। अलबत्ता जो लोग दूसरों को गुमराह करते हैं और बुराई सिखाते हैं, वे अपने गुनाहों के साथ-साथ दूसरों को भटकाने का बोझ भी उठाएँगे।

अल्लाह तआला फ़रमाता है: "और बेशक वे अपने बोझ उठाएँगे और अपने बोझों के साथ और बोझ" (सूरह अनकबूत 29:13)।

और फ़रमाया: "और कुछ बोझ उन लोगों के भी जिन्हें वे बे-समझे गुमराह करते हैं" (सूरह नह्ल 16:25)।

लिहाज़ा क़ुरआन की इन आयतों में आपस में कोई तज़ाद (विरोध) नहीं है।

[42] रसूल भेजने और उनकी बे-अदबी के बाद ही अज़ाब आता है

इससे हमें यह अहम हक़ीक़त मालूम होती है कि दुनिया में क़हरी अज़ाब सिर्फ़ अल्लाह की नाफ़रमानी से नहीं आता, बल्कि जब तक रसूल की नाफ़रमानी और बे-अदबी न हो तब तक नहीं आता।

फ़िरऔन ने ख़ुदाई का दावा किया, बनी इस्राईल के अस्सी हज़ार मासूम बच्चों को ज़बह करवाया, मगर उस पर अज़ाब उसी वक़्त आया जब उसने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को सताया और हज़रत मूसा ने उसके हक़ में बद-दुआ फ़रमाई।

हज़रत मौलाना रूमी फ़रमाते हैं: "अल्लाह तआला किसी क़ौम को उस वक़्त तक रुसवा व तबाह नहीं करता जब तक कि वे किसी साहिब-ए-दिल बुज़ुर्ग का दिल न दुखाएँ।"

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