कुरान - 45:32 सूरह अल-जासिया अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
وَإِذَا قِيلَ إِنَّ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقّٞ وَٱلسَّاعَةُ لَا رَيۡبَ فِيهَا قُلۡتُم مَّا نَدۡرِي مَا ٱلسَّاعَةُ إِن نَّظُنُّ إِلَّا ظَنّٗا وَمَا نَحۡنُ بِمُسۡتَيۡقِنِينَ

Transliteration: (Wa izaa qeela inna wa'dallaahi haqqunw was Saa'atu laa raiba feehaa qultum maa nadree mas Saa'atu in nazunnu illaa zannanw wa maa nahnu bimustaiqineen)

और जब कहा जाता था कि: "बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है और क़ियामत के आने में कोई शक नहीं", तो तुम कहते थे: "हम नहीं जानते कि क़ियामत [69] क्या चीज़ है? हम तो महज़ एक गुमान सा करते हैं और हमें उस पर यक़ीन [70] नहीं"। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-जासिया आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-जासिया तफ़सीर - आयत 32

"और जब कहा जाता था कि: 'बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है और क़ियामत के आने में कोई शक नहीं', तो तुम कहते थे: 'हम नहीं जानते कि क़ियामत [69] क्या चीज़ है? हम तो महज़ एक गुमान सा करते हैं और हमें उस पर यक़ीन [70] नहीं'।"

[69] वादे-इलाही की सच्चाई

अल्लाह के वादों में ख़िलाफ़-वरज़ी का कोई इम्कान नहीं। जिस तरह मौत का आना यक़ीनी है, उसी तरह क़ियामत का बरपा होना भी अटल सच्चाई है।

[70] सच्चा ईमान और अक़्ल की हदें

आख़िरत के मामले में महज़ गुमान या अंदाज़ा काफ़ी नहीं होता। सच्चा ईमान यह है कि इंसान अल्लाह, आख़िरत और तमाम ग़ैब की बातों पर सिर्फ़ इसलिए यक़ीन रखे कि हुज़ूर नबी-ए-करीम ﷺ ने इसकी ख़बर दी है।

अक़्ल को कभी हुज़ूर ﷺ के इरशादात पर हाकिम नहीं बनाना चाहिए, क्योंकि इंसानी अक़्ल ठोकर खा सकती है मगर रसूलुल्लाह ﷺ का फ़रमान कभी ग़लत नहीं हो सकता।

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