कुरान - 54:2 सूरह अल-क़मर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
وَإِن يَرَوۡاْ ءَايَةٗ يُعۡرِضُواْ وَيَقُولُواْ سِحۡرٞ مُّسۡتَمِرّٞ

Transliteration: (Wa iny yaraw aayatany yu'ridoo wa yaqooloo sihrun mustamirr)

और अगर वे कोई निशानी (मोजि़ज़ा) देखते हैं तो मुँह फेर लेते हैं और कहते हैं: "यह तो हमेशा से चला आ रहा जादू है [3]!" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़मर आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़मर तफ़सीर - आयत 2

"और अगर वे कोई निशानी (मोजि़ज़ा) देखते हैं तो मुँह फेर लेते हैं और कहते हैं: 'यह तो हमेशा से चला आ रहा जादू है [3]!'"


[3] जादू का बोहतान और मुनकिरीन की हठधर्मी

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि काफ़िरों का यह कहना सरासर जिहालत और हठधर्मी थी:

  • जादू आसमानों पर असर नहीं करता: जादू नज़र-बंदी और ज़मीनी तसल्ली होती है जिसकी कोई हक़ीक़त नहीं होती। आसमान के भारी-भरकम चाँद को दो टुकड़े कर देना कभी किसी जादूगर के बस में नहीं हो सकता।
  • आसमानी मोजि़ज़ा: चाँद का फटना एक आसमानी और रब्बानी मोजि़ज़ा था जिसे दूर-दूर के मुल्कों के मुसाफ़िरों और तारीख़-दानों ने भी देखा और दर्ज किया। काफ़िरों का इसे जादू कहना महज़ अपनी हार और कुफ़्र को छुपाने का बहाना था।

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