कुरान - 54:3 सूरह अल-क़मर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
وَكَذَّبُواْ وَٱتَّبَعُوٓاْ أَهۡوَآءَهُمۡۚ وَكُلُّ أَمۡرٖ مُّسۡتَقِرّٞ

Transliteration: (Wa kazzaboo wattaba'ooo ahwaaa'ahum; wa kullu amrin mustaqirr)

और उन्होंने झुठलाया और अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिशात की पैरवी की [4], और हर काम का एक मुक़र्ररा वक़्त है [5]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़मर आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़मर तफ़सीर - आयत 3

"और उन्होंने झुठलाया और अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिशात की पैरवी की [4], और हर काम का एक मुक़र्ररा वक़्त है [5]!"


[4] नफ़्सानी ख़्वाहिशात की वजह से इंकार

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि मोजि़ज़ा-ए-शक्कुल क़मर देखने के बाद भी मुशरिकीन अपनी नफ़्सानी ख़्वाहिशात और हसद के ताबे होकर कुफ़्र पर क़ायम रहे। मक्का आने वाले क़ाफ़िलों ने भी इसकी गवाही दी, मगर मुनकिर अपनी ज़िद पर अड़े रहे।

[5] हर काम का मुक़र्ररा वक़्त और इस्लाम का ग़लबा

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'कुल्लु अम्रिम मुस्तक़िर्र' से दो मानी हैं:

  • जिनके मुक़द्दर में कुफ़्र पर मरना लिखा है, वे चाहे जितने मोजि़ज़ात देख लें कभी ईमान नहीं लाएँगे।
  • इस्लाम की फ़तह और ग़लबा हर हाल में तय है; उसका एक मुक़र्ररा वक़्त मुक़द्दर है जिसे दुनिया की कोई ताक़त नहीं रोक सकती।

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