कुरान - 16:112 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

112
وَضَرَبَ ٱللَّهُ مَثَلٗا قَرۡيَةٗ كَانَتۡ ءَامِنَةٗ مُّطۡمَئِنَّةٗ يَأۡتِيهَا رِزۡقُهَا رَغَدٗا مِّن كُلِّ مَكَانٖ فَكَفَرَتۡ بِأَنۡعُمِ ٱللَّهِ فَأَذَٰقَهَا ٱللَّهُ لِبَاسَ ٱلۡجُوعِ وَٱلۡخَوۡفِ بِمَا كَانُواْ يَصۡنَعُونَ

Transliteration: (Wa darabal laahu masalan qaryatan kaanat aaminatam mutma'innatany yaaateehaa rizquhaa raghadam min kulli makaanin fakafarat bi an'umil laahi fa azaaqahal laahu libaasal joo'i walkhawfi bimaa kaanoo yasna'oon)

और अल्लाह ने एक बस्ती (मक्का) की मिसाल बयान फ़रमाई, जो अमन व चैन में थी, उसकी रोज़ी हर जगह से फ़राख़ी (प्रचुरता) से आती थी। फिर उसने अल्लाह की नेमतों की ना-शुक्री की, तो अल्लाह ने उनके करतूतों के बदले उन्हें भूख और ख़ौफ़ का लिबास (मज़ा) चखा दिया [249] [250]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 112 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 112 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और अल्लाह ने एक बस्ती की मिसाल बयान फ़रमाई, जो अमन व चैन में थी... तो अल्लाह ने उनके करतूतों के बदले उन्हें भूख और ख़ौफ़ का लिबास चखा दिया [249] [250]।"

[249] अहले-मक्का की ना-शुक्री और अज़ाब-ए-क़हत

मक्का मुअज़्ज़मा हरम की बरकत से अमन व सुकून और रिज़्क़ की फ़राख़ी का गहवारा था; मगर अहले-मक्का ने हुज़ूर अकरम ﷺ को झुठलाया और ना-शुक्री की। चुनाँचे उन पर सात साल का ऐसा शदीद क़हत पड़ा कि वे मुरदार खाने पर मजबूर हो गए और मुसलमानों के ग़लबे का ख़ौफ़ उन पर मुसल्लत हो गया।

[250] दुनियावी सज़ा इबरत है

ना-शुक्री की सज़ा दुनिया में भी नमूदार होती है ताकि लोग इबरत पकड़ें, मगर यह दुनियावी तकलीफ़ मुकम्मल सज़ा नहीं है; अस्ल और पूरा हिसाब-किताब आख़िरत में होगा।

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