कुरान - 16:126 सूरह अल-नहल अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

126
وَإِنۡ عَاقَبۡتُمۡ فَعَاقِبُواْ بِمِثۡلِ مَا عُوقِبۡتُم بِهِۦۖ وَلَئِن صَبَرۡتُمۡ لَهُوَ خَيۡرٞ لِّلصَّـٰبِرِينَ

Transliteration: (Wa in 'aaqabtum fa'aaqiboo bimisli maa 'ooqibtum bihee wa la'in sabartum lahuwa khairul lissaabireen)

और अगर तुम बदला लो तो उतना ही बदला लो जितना तुम्हें सताया गया था [281]। और अगर तुम सब्र करो तो बेशक सब्र करने वालों के लिए सब्र ही सबसे अच्छा है [282]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-नहल आयत 126 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नह्ल – आयत 126 की तफ़सीर (तफ़सीरे नईमी)

"और अगर तुम बदला लो तो उतना ही बदला लो जितना तुम्हें सताया गया था [281]। और अगर तुम सब्र करो तो बेशक सब्र करने वालों के लिए सब्र ही सबसे अच्छा है [282]।"

[281] शाने-नुज़ूल और अद्ल का क़ानून

शाने-नुज़ूल: जंग-ए-उहुद में जब मुशरिक़ीन ने हुज़ूर अकरम ﷺ के प्यारे चचा हज़रत हमज़ा रज़ियल्लाहु अन्हु के नाक-कान काटकर उनके जिस्म का मुसला किया, तो हुज़ूर ﷺ को शदीद सदमा हुआ और आपने क़सम खाई कि इसके बदले में काफ़िरों के सत्तर आदमियों का मुसला करूँगा। तब यह आयत उतरी कि बदला ज़ियादती के बराबर ही लिया जाए, मुसला न किया जाए। हुज़ूर ﷺ ने अपनी क़सम का कफ़्फ़ारा दिया और सब्र फ़रमाया। इस्लाम में लाशों का मुसला करना सख़्त हराम है।

[282] ज़ाती मामलात में सब्र अफ़ज़ल

ज़ाती हक़ में बदला लेने की ताक़त के बावजूद माफ़ करना और सब्र करना अल्लाह के नज़दीक अफ़ज़ल तरीन अमल है; अलबत्ता अगर मामला दीन, हुदूद या मिल्लत की हिफ़ाज़त का हो तो वहाँ मुआफ़ करना जुर्म है और इन्साफ़ क़ायम करना लाज़िम है।

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