Transliteration: (Allazeena tatawaf faahu mul malaaa'ikatu zaalimeee anfusihim fa alqawus salama maa kunnaa na'malu min sooo'; balaaa innal laaha 'aleemum bimaa kuntum ta'maloon)
"वे जिनकी जान निकालते हैं फ़रिश्ते [55] इस हाल में कि वे अपनी जानों पर ज़ुल्म कर रहे थे [56], तो वे उस वक़्त सुलह डालेंगे कि 'हम तो कोई बुराई नहीं करते थे [57]।' हाँ क्यों नहीं! बेशक अल्लाह ख़ूब जानता है जो कुछ तुम करते थे [58]।'"
मौत देना अल्लाह का काम है, मगर यहाँ फ़रिश्तों की तरफ़ निस्बत की गई क्योंकि वे अल्लाह के हुक्म के ताबेदार हैं। मलकुल-मौत हज़रत इज़्राईल अलैहिस्सलाम के साथ कई मददगार फ़रिश्ते होते हैं, इसलिए जमा का सेग़ा इस्तेमाल हुआ।
इन्सान का एतबार उसके ख़ातिमे (मौत के वक़्त की हालत) पर है। अगर सारी उम्र काफ़िर रहा मगर मरते वक़्त सच्चा ईमान लाया तो मोमिन है; और अगर उम्र भर मोमिन रहा मगर मौत कुफ़्र पर हुई तो काफ़िर गिना जाएगा।
मौत की हौलनाकी देखकर काफ़िर अपने गुनाहों से मुकरेंगे कि हमने कोई बुराई नहीं की थी।
अल्लाह तआला उनके हर अमल से बाख़बर है और क़यामत में उनके अपने हाथ-पाँव उनके ख़िलाफ़ गवाही देकर उनका मुँह बंद कर देंगे।
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