Transliteration: (Wallaahu ja'ala lakum mimmaa khalaqa zilaalanw wa ja'ala lakum minal jibaali aknaananw wa ja'ala lakum saraabeela taqeekumul harra wa saraabeela taqeekum baasakum; kazaalika yutimmu ni'matahoo alaikum la'allakum tuslimoon)
"और अल्लाह ने अपनी बनाई हुई चीज़ों से तुम्हारे लिए साए बनाए [176]... इसी तरह वह अपनी नेमतें तुम पर पूरी फ़रमाता है [180] ताकि तुम हुक्म मानो [181]।"
अल्लाह ने धूप की तपिश से बचाने के लिए दरख़्तों, पहाड़ों और बादलों में साए की नेमत रखी।
पहाड़ों के अन्दर कुदरती ग़ारें और आश्रय बनाए जहाँ इन्सान आफ़तों और दुश्मनों से महफ़ूज़ रह सके।
अरब में गर्मी ज़्यादा होती है, इसलिए ख़ास तौर पर गर्मी से बचाने वाले सूती कपड़ों का ज़िक्र हुआ जो सर्दी व गर्मी दोनों से बचाते हैं। इन्सान के जिस्म पर जानवरों की तरह बाल या पर नहीं हैं, इसलिए अल्लाह ने उसके लिए लिबास की हिकमत पैदा फ़रमाई।
लोहे और फौलाद की ज़िरह जो जंग में तीरों और तलवारों के ज़ख़्मों से हिफ़ाज़त करती है।
अल्लाह तआला ने तमाम मख़्लूक़ात में सबसे ज़्यादा नेमतें इन्सान को अता फ़रमाईं।
जब अल्लाह ने इस फ़ानी जिस्म की हिफ़ाज़त के लिए इतने साज़ो-सामान बनाए, तो यक़ीनन उसने हमेशा रहने वाली रूह की हिफ़ाज़त के लिए भी रूहानी तबियत, ईमान का लिबास और रूहानी तबीब (अम्बिया व औलिया) मुक़र्रर फ़रमाए हैं।
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