कुरान - 53:32 सूरह अन-नज्म अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

32
ٱلَّذِينَ يَجۡتَنِبُونَ كَبَـٰٓئِرَ ٱلۡإِثۡمِ وَٱلۡفَوَٰحِشَ إِلَّا ٱللَّمَمَۚ إِنَّ رَبَّكَ وَٰسِعُ ٱلۡمَغۡفِرَةِۚ هُوَ أَعۡلَمُ بِكُمۡ إِذۡ أَنشَأَكُم مِّنَ ٱلۡأَرۡضِ وَإِذۡ أَنتُمۡ أَجِنَّةٞ فِي بُطُونِ أُمَّهَٰتِكُمۡۖ فَلَا تُزَكُّوٓاْ أَنفُسَكُمۡۖ هُوَ أَعۡلَمُ بِمَنِ ٱتَّقَىٰٓ

Transliteration: (Allazeena yajtaniboona kabaaa'iral ismi walfawaa hisha illal lamam; inna rabbaka waasi'ul maghfirah; huwa a'lamu bikum iz ansha akum minal ardi wa iz antum ajinnatun fee butooni umma haatikum falaa tuzakkooo anfusakum huwa a'lamu bimanit taqaa)

वे लोग जो बड़े गुनाहों [38] और बेहयाई के कामों [39] से बचते हैं, सिवाए छोटे गुनाहों के [40]। बेशक तुम्हारा रब वसीअ मग़्फ़िरत वाला है। वह तुम्हें ख़ूब जानता है जब उसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया और जब तुम अपनी माओं के पेट में छिपे हुए बच्चे थे। तो तुम अपनी पाकीज़गी का दम न भरो [42]; वह ख़ूब जानता है कि कौन सच्चा परहेज़गार है [43]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नज्म आयत 32 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अन-नज्म तफ़सीर - आयत 32

"वे लोग जो बड़े गुनाहों [38] और बेहयाई के कामों [39] से बचते हैं, सिवाए छोटे गुनाहों के [40]। बेशक तुम्हारा रब वसीअ मग़्फ़िरत वाला है। वह तुम्हें ख़ूब जानता है जब उसने तुम्हें मिट्टी से पैदा किया और जब तुम अपनी माओं के पेट में छिपे हुए बच्चे थे। तो तुम अपनी पाकीज़गी का दम न भरो [42]; वह ख़ूब जानता है कि कौन सच्चा परहेज़गार है [43]!"


[38] कबीरा गुनाहों से परहेज़

हज़रत मुफ़्ती अहमद यार ख़ान नईमी रहमतुल्लाह अलैह फ़रमाते हैं कि 'कबा-इर' वे गुनाह हैं जिन पर शरीअत में ख़ास वईद या सज़ा मुक़र्रर है। कबीरा गुनाहों से बचना मग़्फ़िरत का सबब है।

[39] बेहयाई और फ़हश कामों की मज़म्मत

फ़वाहिष से मुराद वे बेहयाई के काम हैं जो अक़्ल और शरीअत दोनों में क़बीह और घिनौने हैं, जैसे ज़िना और चोरी।

[40] सग़ीरा गुनाह और रब की वसीअ मग़्फ़िरत

'ल-मम' से मुराद छोटे गुनाह हैं। जब बंदा कबीरा गुनाहों से बचता है और तौबा करता है, तो अल्लाह अपनी वसीअ रहमत से उसके छोटे गुनाहों को मुआफ़ फ़रमा देता है।

[42] अपनी पाकीज़गी और तक़वे पर घमंड की मुमानअत

इंसान को अपनी नेकियों, नमाज़ों और तक़वे पर नाज़ और घमंड नहीं करना चाहिए कि "मैं बहुत बड़ा मुत्तक़ी हूँ"।

[43] हक़ीक़ी तक़वे की मारिफ़त

हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (रज़ियल्लाहु अन्हु) जैसे जलीलुल-क़द्र सहाबी भी आजिज़ी फ़रमाते थे। सच्चा तक़वा दिल की आजिज़ी और ख़ौफ़-ए-ख़ुदा का नाम है।

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