Transliteration: (Wa qaalal lazeena kafarooo 'a-izaa kunnaa turaabanw wa aabaaa'unaaa a'innaa lamukhrajoon)
"और काफ़िरों ने कहा, 'क्या जब हम और हमारे बाप-दादा मिट्टी हो जाएंगे, तो क्या हम सचमुच (दोबारा ज़िंदा करके) निकाले जाएंगे [132]?'"
यानी मुशरिकीन क़ब्रों से ज़िंदा होकर निकलने और अपने आमाल का हिसाब देने को नामुम्किन समझते थे। उनका ख़्याल था कि जब जिस्म सड़-गल कर ख़ाक में मिल जाएगा तो दोबारा कैसे जमा होगा? वे अल्लाह की क़ुदरत-ए-कामिला को भूल बैठे जिसने उन्हें पहले भी ख़ाक ही से पैदा फ़रमाया था।
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