Transliteration: (Innal lazeena jaaa'oo bilifki 'usbatum minkum; laa tahsaboohu sharral lakum bal huwa khairul lakum; likul limri'im minhum mak tasaba minal-ism; wallazee tawallaa kibrahoo minhum lahoo 'azaabun 'azeem)
"बेशक जो लोग यह बड़ा बोहतान [21] घड़ कर लाए हैं वे तुम्हारे ही अंदर का एक गिरोह [22] हैं; तुम इसे अपने लिए बुरा न समझो, बल्कि यह तुम्हारे लिए सरासर बेहतर है [23]; उनमें से हर शख़्स के लिए उतना ही गुनाह है जितना उसने कमाया [24], और उनमें से जिसने इसका बड़ा हिस्सा उठाया [25], उसके लिए बहुत बड़ा अज़ाब है [26]।"
यहाँ 'बड़ा बोहतान' (इफ़्क) से मुराद वह झूठा और नापाक इल्ज़ाम है जो मुनाफ़िक़ों ने उम्मुल मोमिनीन हज़रत आयशा सिद्दीक़ा (रज़ियल्लाहु अन्हा) पर ग़ज़वा-ए-बनी मुस्तलिक़ (5 हिजरी) से वापसी के वक़्त लगाया था। आपका हार गुम हो गया था जिसकी तलाश में आप क़ाफ़िले से पीछे रह गईं, और बाद में हज़रत सफ़वान बिन मुअत्तल (रज़ियल्लाहु अन्हु) के साथ इंतिहाई पाकीज़गी और एहतिराम के साथ मदीना पहुंचीं। मुनाफ़िक़ों ने इस पर अफ़वाह उड़ाई।
इस बोहतान को फैलाने में सिर्फ़ खुले मुनाफ़िक़ ही नहीं बल्कि बाज़ सादा-लौह मुसलमान भी उनकी बातों में आकर शरीक हो गए थे।
अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि इसे अपने लिए बुरा न समझो, बल्कि यह तुम्हारे लिए बेहतर है। इस आज़माइश के ज़रिए:
हज़रत आयशा सिद्दीक़ा की ता-क़ियामत पाकदामनी की गवाही क़ुरआन में नाज़िल हुई,
मुनाफ़िक़ों का निफ़ाक़ बेनक़ाब हुआ, और
उम्मत को इज़्ज़त व आबरू की हिफ़ाज़त के अज़ीम क़वानीन मिले।
जिसने इस झूठी अफ़वाह में जितना हिस्सा लिया—चाहे जुबान से कहा, सुनकर ख़ामोश रहा, या तसदीक़ की—उसे उसके जुर्म के मुताबिक़ सज़ा मिलेगी।
इस साज़िश का अस्ल सरग़ना और मुहर्रिक मुनाफ़िक़ों का सरदार अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सलूल था, जिसने अपनी ख़बीस नीयत से इस फ़ित्ने को हवा दी थी।
उस मुहर्रिक-ए-आज़म के लिए दुनिया में रुसवाई और हद्दे क़ज़फ़ (अस्सी कोड़े), और आख़िरत में जहन्नम का सबसे गहरा और दर्दनाक अज़ाब मुक़द्दर है।
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