कुरान - 24:15 सूरह अन-नूर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

15
إِذۡ تَلَقَّوۡنَهُۥ بِأَلۡسِنَتِكُمۡ وَتَقُولُونَ بِأَفۡوَاهِكُم مَّا لَيۡسَ لَكُم بِهِۦ عِلۡمٞ وَتَحۡسَبُونَهُۥ هَيِّنٗا وَهُوَ عِندَ ٱللَّهِ عَظِيمٞ

Transliteration: (Iz talaqqawnahoo bi alsinatikum wa taqooloona bi afwaahikum maa laisa lakum bihee 'ilmunw wa tahsaboo nahoo haiyinanw wa huwa 'indal laahi 'azeem)

जब तुम अपनी ज़बानों से इसे एक-दूसरे से ले रहे थे, और अपने मुंह से वह बात कह रहे थे जिसका तुम्हें कोई इल्म न था [30], और तुम इसे एक मामूली बात समझ रहे थे, जबकि अल्लाह के नज़दीक यह बहुत बड़ी (संगीन) बात थी [31]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अन-नूर आयत 15 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

तफ़सीर सूरह अन-नूर – आयत 15

"जब तुम अपनी ज़बानों से इसे एक-दूसरे से ले रहे थे, और अपने मुंह से वह बात कह रहे थे जिसका तुम्हें कोई इल्म न था [30], और तुम इसे हल्की बात समझ रहे थे, जबकि अल्लाह के नज़दीक यह बहुत बड़ी बात थी [31]!"

[30] बे-सनद और बे-इल्म बातों को दोहराना

लोग बिना किसी तहक़ीक़, देखे या जाने सिर्फ़ सुनी-सुनाई अफ़वाहों को एक-दूसरे तक पहुंचा रहे थे। यह आयत सिखाती है कि बिला-तहक़ीक़ बात को आगे बढ़ाना अज़ीम गुनाह है।

[31] ज़बान पर हल्की मगर अल्लाह के यहाँ अज़ीम गुनाह

लोग समझते थे कि यह महज़ एक चर्चा या गपशप है, लेकिन अल्लाह के नज़दीक किसी की आबरू पर हमला करना—ख़ास तौर पर रसूलुल्लाह ﷺ की पाकीज़ा ज़ौजा पर—अर्श को हिला देने वाला इंतिहाई संगीन गुनाह था।

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