Transliteration: (Litastawoo 'alaa zuhoorihee summa tazkuroo ni'mata Rabbikum izastawaitum 'alaihi wa taqooloo Subhaanal lazee sakhkhara lana haaza wa maa kunnaa lahoo muqrineen)
"ताकि तुम उनकी पीठों पर अच्छी तरह जम कर बैठो [18], फिर जब उन पर सीधे बैठ जाओ तो अपने रब की नेमत को याद करो [19] और कहो: 'पाक है वह ज़ात जिसने इसे हमारे ताबेदार बना दिया [20], वर्ना हम इसे क़ाबू में लाने वाले न थे [21];"
सवारी पर सवार होने का मक़सद तकब्बुर या नुमाइश नहीं, बल्कि अल्लाह की इस नेमत का एतिराफ़ करते हुए बा-वक़ार अंदाज़ में सीधा बैठना है।
सवार होते ही दिल और ज़बान से अल्लाह का शुक्र अदा करना चाहिए कि उसने इन ताक़तवर सवारियों को इंसानी ख़िदमत में लगा दिया।
ऊंट और घोड़े जैसे ताक़तवर जानवर इंसान के मुक़ाबले में कहीं ज़्यादा जिस्मानी ताक़त रखते हैं, लेकिन अल्लाह ने उन्हें इंसान का ताबेदार बना दिया ताकि एक छोटा बच्चा भी उनकी नकेल पकड़ कर ले जा सके।
'सुब्हानल्लज़ी सख़्ख़रा लना हाज़ा व मा कुन्ना लहू मुक़रिनीन': हुज़ूर अकरम ﷺ जब सवारी पर सवार होते तो यह दुआ पढ़ते थे, जिसमें बंदा अपनी आजिज़ी का एतिराफ़ करता है कि अगर अल्लाह का फ़ज़्ल न होता तो हम इन सवारियों पर कभी क़ाबू न पा सकते।
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