Transliteration: (Innaaa anzalnaaa ilaikal Kitaaba bilhaqqi fa'budil laaha mukhlisal lahud deen)
"बेशक हमने इस किताब को आपकी तरफ़ हक़ के साथ नाज़िल फ़रमाया है [3], पस आप अपनी बंदगी को अल्लाह के लिए ख़ालिस करते हुए उसी की इबादत कीजिए [4]!"
अगरचे वही लाने वाले हज़रत जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) हैं, मगर अल्लाह ने फ़रमाया: "हमने नाज़िल किया"। जिब्रईल अमीन महज़ वास्ता हैं, कलाम ख़ालिस अल्लाह का है। क़ुरआन मजीद पहले लोहे महफ़ूज़ में था और वहाँ से आसमान से नाज़िल हुआ, जो इसकी बुलंदी और सच्चाई की सनद है।
सूफ़िया-ए-किराम फ़रमाते हैं कि हक़ीक़ी इबादत वह है जो सिर्फ़ रज़ा-ए-इलाही के लिए हो। बंदे की इबादत जन्नत की चाहत या दोज़ख़ के डर से बालातर होकर महज़ अल्लाह की मुहब्बत और बंदगी की ख़ातिर होनी चाहिए।
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