कुरान - 39:2 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

2
إِنَّآ أَنزَلۡنَآ إِلَيۡكَ ٱلۡكِتَٰبَ بِٱلۡحَقِّ فَٱعۡبُدِ ٱللَّهَ مُخۡلِصٗا لَّهُ ٱلدِّينَ

Transliteration: (Innaaa anzalnaaa ilaikal Kitaaba bilhaqqi fa'budil laaha mukhlisal lahud deen)

बेशक हमने इस किताब को आपकी तरफ़ हक़ के साथ नाज़िल फ़रमाया है [3], पस आप अपनी बंदगी को अल्लाह के लिए ख़ालिस करते हुए उसी की इबादत कीजिए [4]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 2 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 2

"बेशक हमने इस किताब को आपकी तरफ़ हक़ के साथ नाज़िल फ़रमाया है [3], पस आप अपनी बंदगी को अल्लाह के लिए ख़ालिस करते हुए उसी की इबादत कीजिए [4]!"

[3] वही-ए-इलाही और लोहे महफ़ूज़

अगरचे वही लाने वाले हज़रत जिब्रईल (अलैहिस्सलाम) हैं, मगर अल्लाह ने फ़रमाया: "हमने नाज़िल किया"। जिब्रईल अमीन महज़ वास्ता हैं, कलाम ख़ालिस अल्लाह का है। क़ुरआन मजीद पहले लोहे महफ़ूज़ में था और वहाँ से आसमान से नाज़िल हुआ, जो इसकी बुलंदी और सच्चाई की सनद है।

[4] इख़्लास फ़िल-इबादत

सूफ़िया-ए-किराम फ़रमाते हैं कि हक़ीक़ी इबादत वह है जो सिर्फ़ रज़ा-ए-इलाही के लिए हो। बंदे की इबादत जन्नत की चाहत या दोज़ख़ के डर से बालातर होकर महज़ अल्लाह की मुहब्बत और बंदगी की ख़ातिर होनी चाहिए।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now