कुरान - 39:3 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

3
أَلَا لِلَّهِ ٱلدِّينُ ٱلۡخَالِصُۚ وَٱلَّذِينَ ٱتَّخَذُواْ مِن دُونِهِۦٓ أَوۡلِيَآءَ مَا نَعۡبُدُهُمۡ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَآ إِلَى ٱللَّهِ زُلۡفَىٰٓ إِنَّ ٱللَّهَ يَحۡكُمُ بَيۡنَهُمۡ فِي مَا هُمۡ فِيهِ يَخۡتَلِفُونَۗ إِنَّ ٱللَّهَ لَا يَهۡدِي مَنۡ هُوَ كَٰذِبٞ كَفَّارٞ

Transliteration: (Alaa lillaahid deenul khaalis; wallazeenat takhazoo min dooniheee awliyaaa'a maa na'buduhum illaa liyuqar riboonaaa ilal laahi zulfaa; innal laaha yahkumu baina hum fee maa hum feehi yakhtalifoon; innal laaha laa yahdee man huwa kaazibun kaffaar)

सुन लो! ख़ालिस इताअत (दीन) सिर्फ़ अल्लाह ही के लिए है [5]; और जिन्होंने उसके सिवा मददगार बना रखे हैं [6] (वे कहते हैं:) हम तो उनकी पूजा सिर्फ़ इसलिए करते हैं [7] ताकि वे हमें अल्लाह के नज़दीक क़ुर्बत दिला दें; बेशक अल्लाह [8] उनके दरमियान उस बात का फ़ैसला फ़रमाएगा जिसमें वे इख़्तिलाफ़ करते हैं [9]; बेशक अल्लाह किसी झूठे, बड़े ना-शुकरे को हिदायत नहीं देता [10]! (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 3 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 3

"सुन लो! ख़ालिस इताअत (दीन) सिर्फ़ अल्लाह ही के लिए है [5]; और जिन्होंने उसके सिवा मददगार बना रखे हैं [6] (वे कहते हैं:) हम तो उनकी पूजा सिर्फ़ इसलिए करते हैं [7] ताकि वे हमें अल्लाह के नज़दीक क़ुर्बत दिला दें; बेशक अल्लाह [8] उनके दरमियान उस बात का फ़ैसला फ़रमाएगा जिसमें वे इख़्तिलाफ़ करते हैं [9]; बेशक अल्लाह किसी झूठे, बड़े ना-शुकरे को हिदायत नहीं देता [10]!"

[5] दीन और इबादत का ख़ालिस होना

यहाँ "दीन" से मुराद इबादत है। इबादत का मुस्तहिक़ सिर्फ़ अल्लाह है और वह भी रियाकारी व शिर्क से पाक ख़ालिस होनी चाहिए।

[6] औलिया (झूठे माबूद)

यहाँ "औलिया" से मुराद काफ़िरों के तराशे हुए बुत और झूठे माबूद हैं, अल्लाह के नेक औलिया-ए-किराम नहीं।

[7] बुत-परस्ती का झूठा बहाना

मुशरिकीन कहते थे कि हम इन बुतों की पूजा इसलिए करते हैं ताकि वे हमें अल्लाह के क़रीब कर दें। अल्लाह ने उनके इस शिर्क को मुस्तरद फ़रमाया। अल्लाह के मुक़र्रब बंदों और अंबिया का वसीला पकड़ना जाइज़ है (सूरह अल-माइदा: 35), मगर किसी को माबूद समझ कर उसकी पूजा करना खुला शिर्क है। काबा की तरफ़ रुख़ करके नमाज़ पढ़ना इबादत है, मगर बुत के आगे झुकना शिर्क है।

[8] क़तई फ़ैसले का इख़्तियार

अल्लाह तआला ही तमाम मुआमलात का फ़ैसला फ़रमाने वाला है। बुतों को शफ़ीअ मानना कुफ़्र है।

[9] रोज़े जज़ा का हक़ीक़ी फ़ैसला

क़ियामत के दिन अल्लाह अहले ईमान को जन्नत और मुनकिरीन को जहन्नम में दाख़िल करके फ़ैसला फ़रमाएगा।

[10] झूठे और ना-शुकरे की महरूमी

जो शख़्स कुफ़्र व ना-शुक्री पर अड़ा रहे, अल्लाह उसे अपनी हिदायत की तौफ़ीक़ से महरूम कर देता है।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now