Transliteration: (Afaman sharahal laahu sadrahoo lil Islaami fahuwa 'alaa noorim mir Rabbih; fa wailul lilqaasiyati quloobuhum min zikril laah; ulaaa'ika fee dalaalim mubeen)
"तो क्या वह शख़्स जिसका सीना अल्लाह ने इस्लाम के लिए खोल दिया [61], पस वह अपने रब की तरफ़ से एक नूर (रौशनी) पर है [62] (क्या वह संगदिल जैसा है?) पस ख़राबी है उन लोगों के लिए जिनके दिल अल्लाह के ज़िक्र से सख़्त हो चुके हैं [63] [64]! वे खुली गुमराही में हैं।"
इस्लाम के लिए दिल का खुलना अल्लाह का अज़ीम नूर और फ़ज़्ल है।
आम मोमिन का नूर चिराग़ की तरह, औलिया का नूर रौशन बल्ब की तरह, और हुज़ूर ﷺ का नूरे मुबारक़ सूरज की तरह है जिससे पूरी कायनात मुनव्वर है।
जिनके दिल अल्लाह के ज़िक्र से मुतअस्सिर नहीं होते वे पत्थर से भी ज़्यादा सख़्त हैं।
कसरत से दुरुद शरीफ़ पढ़ने और ज़िक्रे इलाही करने से दिल की सख़्ती दूर होती है और ख़ात्मा बिल-ख़ैर नसीब होता है।
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