कुरान - 39:73 सूरह अज़-ज़ुमर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

73
وَسِيقَ ٱلَّذِينَ ٱتَّقَوۡاْ رَبَّهُمۡ إِلَى ٱلۡجَنَّةِ زُمَرًاۖ حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءُوهَا وَفُتِحَتۡ أَبۡوَٰبُهَا وَقَالَ لَهُمۡ خَزَنَتُهَا سَلَٰمٌ عَلَيۡكُمۡ طِبۡتُمۡ فَٱدۡخُلُوهَا خَٰلِدِينَ

Transliteration: (Wa seeqal lazeenat taqaw Rabbahum ilal Jannati zumaraa hattaaa izaa jaaa'oohaa wa futihat abwaabuhaa wa qaala lahum khazanatuhaa salaamun 'alaikum tibtum fadkhuloohaa khaalideen)

और जो लोग अपने रब से डरते रहे उनकी सवारियों को गिरोह-दर-गिरोह जन्नत की तरफ़ (बा-इज़्ज़त) ले जाया जाएगा [181] [182]; यहाँ तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे और उसके दरवाज़े पहले से खुले होंगे [183], और उसके दरबान उनसे कहेंगे: 'सलाम हो तुम पर [184]! तुम बहुत पाकीज़ा रहे, सो इसमें हमेशा रहने के लिए दाख़िल हो जाओ [185] ।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अज़-ज़ुमर आयत 73 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अज़-ज़ुमर तफ़सीर - आयत 73

"और जो लोग अपने रब से डरते रहे उनकी सवारियों को गिरोह-दर-गिरोह जन्नत की तरफ़ (बा-इज़्ज़त) ले जाया जाएगा [181] [182]; यहाँ तक कि जब वे वहाँ पहुँचेंगे और उसके दरवाज़े पहले से खुले होंगे [183], और उसके दरबान उनसे कहेंगे: 'सलाम हो तुम पर [184]! तुम बहुत पाकीज़ा रहे, सो इसमें हमेशा रहने के लिए दाख़िल हो जाओ [185] ।'"

[181] मुत्तक़ी बंदों का इक़राम

जिन्होंने दुनिया में तक़्वा और परहेज़गारी की ज़िंदगी गुज़ारी, अल्लाह के अहकाम पर चले और गुनाहों से बचे, उनका महशर में बेमिसाल एज़ाज़ व इक्राम होगा।

[182] जन्नती सवारियों पर गिरोह-वार आमद

मोमिनीन को पैदल नहीं बल्कि नूरानी सवारियों पर बा-इज़्ज़त जन्नत की तरफ़ ले जाया जाएगा। अंबिया, सिद्दीक़ीन, शोहदा और सालेहीन अपने-अपने मर्तबों के मुताबिक़ पुर-वक़ार गिरोहों में तशरीफ़ ले जाएंगे।

[183] इस्तक़बाल के लिए जन्नत के दरवाज़ों का खुला होना

जहन्नम के दरवाज़े काफ़िरों के आने के बाद खोले जाएंगे, मगर जन्नत के दरवाज़े अहले ईमान के पहुँचने से पहले ही उनके इस्तक़बाल के लिए खोल दिए जाएंगे ताकि मेहमानों को इंतज़ार की ज़हमत न हो।

[184] फ़रिश्तों का सलाम और ख़ुश-आमदीद

जन्नत के दारोग़ा (हज़रत रिज़वान अलैहिस्सलाम और मलाइका) निहायत ताज़ीम से सलाम पेश करेंगे और कहेंगे: 'सलामती हो तुम पर, मुबारक हो तुम्हें!'

[185] हमेशा की जन्नती ज़िंदगी

कहा जाएगा कि तुम शिर्क और गुनाहों की गंदगियों से पाक रहे, अब इस नेमतों भरी जन्नत में दाख़िल हो जाओ जहाँ न कभी मौत आएगी, न बुढ़ापा, और न कोई नेमत ज़वाल पज़ीर होगी।

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