कुरान - 47:25 सूरह मुहम्मद अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

25
إِنَّ ٱلَّذِينَ ٱرۡتَدُّواْ عَلَىٰٓ أَدۡبَٰرِهِم مِّنۢ بَعۡدِ مَا تَبَيَّنَ لَهُمُ ٱلۡهُدَى ٱلشَّيۡطَٰنُ سَوَّلَ لَهُمۡ وَأَمۡلَىٰ لَهُمۡ

Transliteration: (Innal lazeenar taddoo 'alaaa adbaarihim min ba'di maa tabaiyana lahumul hudash Shaitaanu sawwala lahum wa amlaa lahum)

बेशक जो लोग पीठ फेरकर फिर गए [65], इसके बाद कि उन पर हिदायत बिल्कुल साफ़ हो चुकी थी, शैतान ने उन्हें बहका दिया और उन्हें लम्बी उम्मीदों में डाल दिया [66]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह मुहम्मद आयत 25 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह मुहम्मद तफ़सीर - आयत 25

"बेशक जो लोग पीठ फेरकर फिर गए [65], इसके बाद कि उन पर हिदायत बिल्कुल साफ़ हो चुकी थी, शैतान ने उन्हें बहका दिया और उन्हें लम्बी उम्मीदों में डाल दिया [66]।"


[65] हिदायत ज़ाहिर होने के बाद मुँह मोड़ना

इससे मुराद अहले-किताब के वे उलमा और सरदार हैं जिन्होंने अपनी किताबों में हुज़ूर अकरम ﷺ की निशानियाँ और सच्चाई पहचान ली थी, लेकिन हसद के कारण मुँह मोड़ लिया; या वे मुनाफ़िक़ हैं जिन्होंने नबी ﷺ की मुबारक महफ़िलों में हक़ को साफ़ देख लिया मगर फिर भी कुफ़्र पर अड़े रहे।


[66] शैतान के दो बड़े धोखे और फ़रेब

शैतान इंसान को गुमराह करने के लिए दो मुख्य हथकंडे इस्तेमाल करता है:

  1. बुराई को ख़ूबसूरत बनाकर पेश करना ('सय्यल लहुम'): वह गुनाहों और नाफ़रमानियों पर ऐसी पॉलिश चढ़ाता है कि इंसान उन्हें आधुनिकता, आज़ादी या चालाकी समझने लगता है।
  2. तुल-ए-अमल (लम्बी उम्मीदें और टालमटोल): वह इंसान के दिल में यह झूठी उम्मीद डालता है कि अभी ज़िंदगी बहुत बाक़ी है, बुढ़ापे में या मरने से पहले तौबा कर लेना। जबकि समझदार मोमिन अपनी हर साँस को आख़िरी समझकर फ़ौरन नेक आमाल की तरफ़ बढ़ता है।

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