Transliteration: (Wa izaa tutlaa 'alaihim Aayaatunaa baiyinaatin qaaloo maa haazaa illaa rajuluny yureedu ai-yasuddakum 'ammaa kaana ya'budu aabaaa'ukum wa qaaloo maa haazaaa illaaa ifkum muftaraa; wa qaalal lazeena kafaroo lilhaqqi lammaa jaaa'ahum in haazaaa illaa sihrum mubeen)
"और जब उनके सामने हमारी रौशन आयात पढ़ी जाती हैं, तो वे कहते हैं: 'यह तो बस ऐसा आदमी है [127] जो तुम्हें उन चीज़ों से रोकना चाहता है जिनकी तुम्हारे बाप-दादा इबादत करते थे [128]।' और वे कहते हैं: 'यह तो बस एक गढ़ा हुआ झूठ है [129]।' और काफ़िरों ने हक़ के बारे में कहा: 'यह तो बस खुला जादू है [130]!'"
काफ़िर हुज़ूर ﷺ को "बस एक आदमी" कहकर आपकी नबुव्वत और अज़मत को घटाने की कोशिश करते थे ताकि सादा-लौह लोगों को मुतास्सिर कर सकें।
मुशरिकीन के सामने दो बुनियादी ख़राबियां थीं: एक यह कि वे बाप-दादा के बातिल तरीक़ों को अल्लाह के हुक्म पर तरजीह देते थे, और दूसरी यह कि उनके दिल रसूल ﷺ की अज़मत व मोहब्बत से ख़ाली थे।
क़ुरआन को "गढ़ा हुआ झूठ" कहना उनकी अंधी अदावत और जहालत की दलील थी।
काफ़िरों की दलीलें मुतज़ाद थीं—कभी क़ुरआन को शायरी, कभी कहानी और कभी खुला जादू कहते थे, जो उनकी मुकम्मल बद-हवासी का सुबूत था।
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