कुरान - 34:52 सूरह सबअ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

52
وَقَالُوٓاْ ءَامَنَّا بِهِۦ وَأَنَّىٰ لَهُمُ ٱلتَّنَاوُشُ مِن مَّكَانِۭ بَعِيدٖ

Transliteration: (Wa qaaloo aamannaa bihee wa annaa lahumut tanaawushu min makaanin ba'eed)

और वे कहेंगे, "हम उस (हक़) पर ईमान लाए;" और इतनी दूर की जगह से (ईमान का) हाथ आना उनके लिए कैसे मुम्किन हो सकता है [149]? (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह सबअ आयत 52 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह सबा तफ़सीर - आयत 52

"और वे कहेंगे: 'हम उस पर ईमान लाए!' और इतनी दूर की जगह से ईमान का हाथ आना कैसे मुम्किन हो सकता है [149]?"

[149] अज़ाब देखने के बाद ईमान का ना-मक़बूल होना

मौत या अज़ाब का मुशाहदा करने के बाद काफ़िर चीख़-पुकार करेंगे कि हम ईमान ले आए, मगर वक़्त गुज़र जाने के बाद का ईमान कोई फ़ायदा नहीं देता। आख़िरत दारुल जज़ा है, दारुल अमल नहीं; लिहाज़ा वहाँ से ईमान का तलब करना ऐसा ही नामुम्किन है जैसे कोई दूर से किसी चीज़ को पकड़ना चाहे।

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