Transliteration: (Faraja'a Moosaaa ilaa qawmihee ghadbaana asifaa; qaala yaa qawmi alam ya'idkum Rabbukum wa'dan hasanaa; afataala 'alaikumul 'ahdu am arattum ai yahilla 'alaikum ghadabum mir Rabbikum fa akhlaftum maw'idee)
"फिर मूसा अपनी क़ौम की तरफ़ ग़ज़बनाक और रंजीदा होकर पलटे [116]; फ़रमाया, 'ऐ मेरी क़ौम! क्या तुम्हारे रब ने तुमसे एक अच्छा वादा न फ़रमाया था [117]? क्या तुम पर मुद्दत लंबी गुज़र गई [118] या तुमने चाहा कि तुम पर तुम्हारे रब का ग़ज़ब नाज़िल हो, इसलिए तुमने मेरे वादे के ख़िलाफ़ किया [119] ?' "
इससे मालूम हुआ कि दीन की ख़ातिर और बुराई देखकर ग़ुस्सा व रंज का इज़हार करना सुन्नते अंबिया और सवाब का काम है। बुराई देखकर ख़ामोश रहना या बेअसर रहना मोमिन की शान नहीं।
अच्छे वादे से मुराद तौरात शरीफ़ की बशारत थी जिसमें एक हज़ार सूरतें थीं और हर सूरत में एक हज़ार आयतें, जो हिदायत, नूर और बनी इस्राईल की इज़्ज़त का ज़रिया थीं।
हज़रत मूसा ने फ़रमाया कि मैं तो सिर्फ़ चालीस दिन के लिए गया था! इतनी मुख़्तसर मुद्दत में तुम शिर्क में मुब्तला हो गए, तो मेरे बाद तुम्हारा क्या हाल होगा?
उन्होंने तौहीद पर क़ायम रहने का वादा तोड़ा, जो अल्लाह के ग़ज़ब को दावत देने वाला अमल था।
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