Transliteration: (Qaaloo yaa wailanaa mam ba'asanaa mim marqadinaa; haaza maa wa'adar Rahmanu wa sadaqal mursaloon)
"वे कहेंगे: 'हाय हमारी ख़राबी [80]! किसने हमें हमारी ख़्वाबगाह से जगा दिया [81]? यह वही है जिसका रहमान ने वादा फ़रमाया था [82], और रसूलों ने सच ही फ़रमाया था [83]!'"
क़ब्रों से उठते ही जब काफ़िर महशर की भयानक तपिश और अज़ाब के फ़रिश्तों को देखेंगे, तो वे अफ़सोस और हसरत से चीख़ उठेंगे।
काफ़िरों को बरज़ख़ में अज़ाब तो होता था, लेकिन दोनों सूरों के दरमियान चालीस साल के अरसे में उनका अज़ाब मौक़ूफ़ कर दिया गया था और वे सोए हुए थे। महशर का अज़ाब देखकर उन्हें क़ब्र का अज़ाब नींद जैसा महसूस होगा।
उन्हें या तो मोमिन जवाब देंगे या वे ख़ुद बे-साख़्ता कह उठेंगे कि यह वही दिन है जिसका रहमान ने अपनी किताबों में वादा फ़रमाया था।
उस दिन काफ़िर मजबूरन ऐतराफ़ करेंगे कि अल्लाह के सच्चे रसूलों ने जो कुछ फ़रमाया था, वह ऐन हक़ और सच था।
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