कुरान - 6:122 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

122
أَوَمَن كَانَ مَيۡتٗا فَأَحۡيَيۡنَٰهُ وَجَعَلۡنَا لَهُۥ نُورٗا يَمۡشِي بِهِۦ فِي ٱلنَّاسِ كَمَن مَّثَلُهُۥ فِي ٱلظُّلُمَٰتِ لَيۡسَ بِخَارِجٖ مِّنۡهَاۚ كَذَٰلِكَ زُيِّنَ لِلۡكَٰفِرِينَ مَا كَانُواْ يَعۡمَلُونَ

Transliteration: (Awa man kaana maitan fa ahyainaahu wa ja'alnaa lahoo noorany yamshee bihee fin naasi kamamm masaluhoo fiz zulumaati laisa bikhaarijim minhaa; kazaalika zuyyina lilkaafireena maa kaanoo ya'maloon)

क्या वह, जो मरा हुआ था, फिर हमने उसे ज़िन्दगी दी और उसके लिए एक रोशनी बना दी [270], जिससे वह लोगों के बीच चलता है—उसके समान हो सकता है जो अंधेरों में है [271] जिनसे वह निकल ही नहीं सकता? इसी तरह काफ़िरों के लिए उनके काम अच्छे करके दिखाए गए हैं [272]। (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 122 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-अनआम – आयत 122 की तफ़्सीर

✅ [270] ईमान से ज़िन्दगी, कुफ़्र से रूहानी मौत

इस आयत में ईमान को रूहानी ज़िन्दगी और कुफ़्र को रूहानी मौत बताया गया है। जिसे हिदायत मिलती है वह जीवित हो जाता है, और जिसका दिल हक़ से बंद हो, वह मरे हुए जैसा है।

✅ [271] हिदायत एक है, गुमराही कई

रोशनी (हिदायत) एक है, जबकि अंधेरे (गुमराही) कई रूप में होते हैं—हक़ का रास्ता एक है, लेकिन ग़लत राहें अनगिनत हैं।

✅ [272] मोमिन और काफ़िर के गुनाह पर रवैये का फ़र्क़

मोमिन गुनाह पर पछतावा करता है, इसलिए उसका ईमान बाक़ी रहता है; जबकि काफ़िर गुनाह पर ग़ुरूर करता है और उसे अच्छा समझता है—ऐसा शख़्स मग़फ़िरत का हक़दार नहीं।

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