कुरान - 6:71 सूरह अल-अनाम अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

71
قُلۡ أَنَدۡعُواْ مِن دُونِ ٱللَّهِ مَا لَا يَنفَعُنَا وَلَا يَضُرُّنَا وَنُرَدُّ عَلَىٰٓ أَعۡقَابِنَا بَعۡدَ إِذۡ هَدَىٰنَا ٱللَّهُ كَٱلَّذِي ٱسۡتَهۡوَتۡهُ ٱلشَّيَٰطِينُ فِي ٱلۡأَرۡضِ حَيۡرَانَ لَهُۥٓ أَصۡحَٰبٞ يَدۡعُونَهُۥٓ إِلَى ٱلۡهُدَى ٱئۡتِنَاۗ قُلۡ إِنَّ هُدَى ٱللَّهِ هُوَ ٱلۡهُدَىٰۖ وَأُمِرۡنَا لِنُسۡلِمَ لِرَبِّ ٱلۡعَٰلَمِينَ

Transliteration: (Qul anad'oo min doonil laahi maa laa yanfa'unaa wa laa yadurrunaa wa nuraddu 'alaaa a'qaabina ba'da iz hadaanal laahu kallazis tahwat hush Shayaateenu fil ardi hairaana lahooo ashaabuny yad'oo nahooo ilal huda' tinaa; qul inna hudal laahi huwal hudaa wa umirnaa linuslima li Rabbil 'aalameen)

कहो, "क्या हम अल्लाह के सिवा ऐसी चीज़ की इबादत करें जो न हमें फ़ायदा देती है और न नुकसान पहुँचाती है? और क्या हम अल्लाह के हमें हिदायत देने के बाद फिर अपनी एड़ियों के बल उलटे फिर जाएँ? [143] यह ऐसे है जैसे किसी को शैतान ने ज़मीन में भटका दिया हो और वह हैरान हो, जबकि उसके साथी उसे हिदायत की तरफ बुला रहे हों। [144] कह दो, 'अल्लाह की हिदायत ही असली हिदायत है, और हमें हुक्म दिया गया है कि हम सारे जहानों के रब के सामने सर झुका दें।'" (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-अनाम आयत 71 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरा अल-अनआम – आयत 71

✅ [143] मुरतद होने और काफ़िरों के बहकावे से चेतावनी

यह आयत उन काफ़िरों का जवाब है जो मुसलमानों को इस्लाम छोड़ने के लिए लालच या धमकी देते थे। इसमें बताया गया है कि हिदायत मिलने के बाद मुरतद होना बहुत बड़ा गुनाह है, और आलिम के लिए यह और भी संगीन है। काफ़िर को जिज़्या के साथ रहने की इजाज़त हो सकती है, लेकिन मुरतद के लिए या तो इस्लाम में वापसी या सज़ा-ए-मौत है। हिदायत के बाद पलटना हक़ से जानबूझकर गद्दारी है।

✅ [144] शैतान के बहकाए मुसाफ़िर और नेक साथियों की अहमियत

मिसाल दी गई है एक ऐसे मुसाफ़िर की जिसे शैतान ने रास्ता भुला दिया, जबकि उसके दोस्त उसे सही रास्ते की तरफ पुकार रहे हों। इससे सिखाया गया है कि जो हमें दीन से दूर ले जाए — चाहे वह क़रीबी रिश्तेदार ही क्यों न हो — वह असली दोस्त नहीं है, और एक अजनबी नेक इंसान ही सच्चा दिनी साथी है। इसलिए रूहानी वफ़ादारी को ख़ून के रिश्तों पर तरजीह देना हिदायत पर क़ायम रहने के लिए ज़रूरी है।

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