Transliteration: (Qul anad'oo min doonil laahi maa laa yanfa'unaa wa laa yadurrunaa wa nuraddu 'alaaa a'qaabina ba'da iz hadaanal laahu kallazis tahwat hush Shayaateenu fil ardi hairaana lahooo ashaabuny yad'oo nahooo ilal huda' tinaa; qul inna hudal laahi huwal hudaa wa umirnaa linuslima li Rabbil 'aalameen)
यह आयत उन काफ़िरों का जवाब है जो मुसलमानों को इस्लाम छोड़ने के लिए लालच या धमकी देते थे। इसमें बताया गया है कि हिदायत मिलने के बाद मुरतद होना बहुत बड़ा गुनाह है, और आलिम के लिए यह और भी संगीन है। काफ़िर को जिज़्या के साथ रहने की इजाज़त हो सकती है, लेकिन मुरतद के लिए या तो इस्लाम में वापसी या सज़ा-ए-मौत है। हिदायत के बाद पलटना हक़ से जानबूझकर गद्दारी है।
मिसाल दी गई है एक ऐसे मुसाफ़िर की जिसे शैतान ने रास्ता भुला दिया, जबकि उसके दोस्त उसे सही रास्ते की तरफ पुकार रहे हों। इससे सिखाया गया है कि जो हमें दीन से दूर ले जाए — चाहे वह क़रीबी रिश्तेदार ही क्यों न हो — वह असली दोस्त नहीं है, और एक अजनबी नेक इंसान ही सच्चा दिनी साथी है। इसलिए रूहानी वफ़ादारी को ख़ून के रिश्तों पर तरजीह देना हिदायत पर क़ायम रहने के लिए ज़रूरी है।
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