Transliteration: (Wa iz qaala Ibraaheemu li abeehi Aazara a-tattakhizu asnaaman aalihatan inneee araaka wa qawmaka fee dalaalim mubeen)
इस आयत में ज़िक्र है कि हज़रत इब्राहीम عليه السلام ने अपने पिता आज़र से बात करते हुए उनकी बुत-परस्ती पर सवाल उठाया। उनका अंदाज़ चिंता और हिम्मत दोनों को दर्शाता है — अदब के साथ लेकिन दृढ़ता से। यह दिखाता है कि पैग़म्बरी का फ़र्ज़ है कि अपने घरवालों को भी हक़ की दावत दे, और ईमान के मामलों में कोई समझौता न करे।
हज़रत इब्राहीम عليه السلام ने साफ़ शब्दों में कह दिया कि उनके पिता और उनकी क़ौम ख़ुली गुमराही में हैं। बुत-परस्ती, जो न अक़्ल पर आधारित है और न इलाही दलील पर, उसे ख़ुला गुमराह होना कहा गया। यह अंदाज़ बताता है कि नबी को चाहिए कि वह झूठ को बेबाक़ी से उजागर करे, चाहे वह समाज में कितना ही रचा-बसा क्यों न हो।
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