Transliteration: (Wa dakhalal madeenata 'alaa heene ghaflatim min ahlihaa fawajada feeha raju laini yaqtatilaani haazaa min shee'atihee wa haaza min 'aduwwihee fastaghaasahul lazee min shee'atihee 'alal lazee min 'aduwwihee fawakazahoo Moosaa faqadaa 'alaihi qaala haaza min 'amalish Shaitaani innahoo 'aduwwum mmudillum mubeen)
"और वे शहर में ऐसे वक़्त दाख़िल हुए जब वहाँ के लोग बे-ख़बर (आराम में) थे [36], तो उन्होंने वहाँ दो आदमियों को लड़ते पाया [37]; यह एक उनकी अपनी क़ौम (बनी इसराईल) का था और दूसरा उनके दुश्मनों (क़िब्तियों) में से था; तो जो उनकी अपनी क़ौम का था उसने अपने दुश्मन के ख़िलाफ़ उनसे मदद मांगी [38], तो मूसा ने उसे एक घूंसा मारा [39] और उसका काम तमाम कर दिया [40]! (मूसा ने) कहा, 'यह शैतान का काम था [41]; बेशक वह खुला दुश्मन और गुमराह करने वाला है [42]।'"
हज़रत मूसा दोपहर के क़ैलूले के वक़्त या मगरिब व इशा के दरमियान शहर में दाख़िल हुए जब बाज़ार बंद थे और लोग अपने घरों में आराम कर रहे थे।
एक शख़्स इसराईली (सामरी या कोई दूसरा मोमिन) था और दूसरा फ़िरऔन का क़िब्ती रसोइया (फ़ातून) था जो इसराईली पर ज़ुल्म कर रहा था और ज़बरदस्ती बेगार कराना चाहता था।
इसराईली ने हज़रत मूसा को देखकर फ़रियाद की और मदद मांगी। हज़रत मूसा मज़लूम की हिमायत के लिए आगे बढ़े।
हज़रत मूसा ने ज़ालिम क़िब्ती को रोकने और डांटने के लिए सिर्फ़ एक घूंसा मारा, क़त्ल करने की कोई नीयत न थी।
हज़रत मूसा के मुबारक हाथ में अल्लाह ने ऐसी कुव्वत रखी थी कि उसी एक घूंसे से वह काफ़िर ज़ालिम ढेर हो गया और मर गया।
हज़रत मूसा ने फ़रमाया कि इस ग़ुस्से और झगड़े का सबब शैतान था, क्योंकि उन्होंने ब-हैसियत नबी अभी जंग का हुक्म नहीं पाया था।
शैतान इंसान को बहकाकर ऐसे हालात पैदा करता है जिससे फ़साद बरपा हो।
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