कुरान - 28:15 सूरह अल-क़सस अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

15
وَدَخَلَ ٱلۡمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفۡلَةٖ مِّنۡ أَهۡلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيۡنِ يَقۡتَتِلَانِ هَٰذَا مِن شِيعَتِهِۦ وَهَٰذَا مِنۡ عَدُوِّهِۦۖ فَٱسۡتَغَٰثَهُ ٱلَّذِي مِن شِيعَتِهِۦ عَلَى ٱلَّذِي مِنۡ عَدُوِّهِۦ فَوَكَزَهُۥ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيۡهِۖ قَالَ هَٰذَا مِنۡ عَمَلِ ٱلشَّيۡطَٰنِۖ إِنَّهُۥ عَدُوّٞ مُّضِلّٞ مُّبِينٞ

Transliteration: (Wa dakhalal madeenata 'alaa heene ghaflatim min ahlihaa fawajada feeha raju laini yaqtatilaani haazaa min shee'atihee wa haaza min 'aduwwihee fastaghaasahul lazee min shee'atihee 'alal lazee min 'aduwwihee fawakazahoo Moosaa faqadaa 'alaihi qaala haaza min 'amalish Shaitaani innahoo 'aduwwum mmudillum mubeen)

और वे शहर में ऐसे वक़्त दाख़िल हुए जब वहाँ के लोग बे-ख़बर (आराम में) थे [36], तो उन्होंने वहाँ दो आदमियों को लड़ते पाया [37]; यह एक उनकी अपनी क़ौम (बनी इसराईल) का था और दूसरा उनके दुश्मनों (क़िब्तियों) में से था; तो जो उनकी अपनी क़ौम का था उसने अपने दुश्मन के ख़िलाफ़ उनसे मदद मांगी [38], तो मूसा ने उसे एक घूंसा मारा [39] और उसका काम तमाम कर दिया [40]! (मूसा ने) कहा, 'यह शैतान का काम था [41]; बेशक वह खुला दुश्मन और गुमराह करने वाला है [42]।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-क़सस आयत 15 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह अल-क़सस तफ़सीर - आयत 15

"और वे शहर में ऐसे वक़्त दाख़िल हुए जब वहाँ के लोग बे-ख़बर (आराम में) थे [36], तो उन्होंने वहाँ दो आदमियों को लड़ते पाया [37]; यह एक उनकी अपनी क़ौम (बनी इसराईल) का था और दूसरा उनके दुश्मनों (क़िब्तियों) में से था; तो जो उनकी अपनी क़ौम का था उसने अपने दुश्मन के ख़िलाफ़ उनसे मदद मांगी [38], तो मूसा ने उसे एक घूंसा मारा [39] और उसका काम तमाम कर दिया [40]! (मूसा ने) कहा, 'यह शैतान का काम था [41]; बेशक वह खुला दुश्मन और गुमराह करने वाला है [42]।'"

[36] शहर में दाख़िला

हज़रत मूसा दोपहर के क़ैलूले के वक़्त या मगरिब व इशा के दरमियान शहर में दाख़िल हुए जब बाज़ार बंद थे और लोग अपने घरों में आराम कर रहे थे।

[37] दो आदमियों का झगड़ा

एक शख़्स इसराईली (सामरी या कोई दूसरा मोमिन) था और दूसरा फ़िरऔन का क़िब्ती रसोइया (फ़ातून) था जो इसराईली पर ज़ुल्म कर रहा था और ज़बरदस्ती बेगार कराना चाहता था।

[38] मज़लूम की मदद की पुकार

इसराईली ने हज़रत मूसा को देखकर फ़रियाद की और मदद मांगी। हज़रत मूसा मज़लूम की हिमायत के लिए आगे बढ़े।

[39] मूसा अलैहिस्सलाम का घूंसा मारना

हज़रत मूसा ने ज़ालिम क़िब्ती को रोकने और डांटने के लिए सिर्फ़ एक घूंसा मारा, क़त्ल करने की कोई नीयत न थी।

[40] क़िब्ती की अचानक मौत

हज़रत मूसा के मुबारक हाथ में अल्लाह ने ऐसी कुव्वत रखी थी कि उसी एक घूंसे से वह काफ़िर ज़ालिम ढेर हो गया और मर गया।

[41] शैतान के बहकावे की तरफ़ निस्बत

हज़रत मूसा ने फ़रमाया कि इस ग़ुस्से और झगड़े का सबब शैतान था, क्योंकि उन्होंने ब-हैसियत नबी अभी जंग का हुक्म नहीं पाया था।

[42] शैतान का खुला दुश्मन होना

शैतान इंसान को बहकाकर ऐसे हालात पैदा करता है जिससे फ़साद बरपा हो।

Sign up for Newsletter

×

Download Our Quran App

For a faster and smoother experience,
install our mobile app now.

Download Now