Transliteration: (Fee bid'i sineen; lillaahil amru min qablu wa mim ba'd; wa yawma'iziny yafrahul mu'minoon)
"चंद ही बरसों में [4]; पहले भी और बाद में भी सारा इख़्तियार अल्लाह ही का है [5]; और उस दिन मोमिन ख़ुशी मनाएंगे [6];"
अरबी ज़बान में "बिज़अ" तीन से नौ साल तक की मुद्दत को कहा जाता है। हज़रत अबू बकर सिद्दीक़ रज़ियल्लाहु अन्हु ने मुशरिकीन से शर्त लगाई थी, और ठीक सातवें साल यह पेशीनगोई हरफ़-ब-हरफ़ सच साबित हुई जब कैसर-ए-रूम ने फारसियों पर शानदार फतह हासिल की।
हार हो या जीत, बुलंदी हो या पस्ती, हर हाल में हुक्म और इख़्तियार सिर्फ़ अल्लाह तआला का है। कोई क़ौम अपनी ताक़त के बल पर नहीं जीतती, बल्कि अल्लाह की तक़दीर और उसकी मशिय्यत ही कारफ़रमा होती है।
जिस दिन रूमियों की फतह की ख़बर मदीना मुनव्वरा पहुँची, उसी दिन ग़ज़वा-ए-बदर में मुसलमानों को मुशरिकीन पर अज़ीम फतह नसीब हुई थी। इस तरह अहले ईमान को दोहरी ख़ुशी हासिल हुई—एक अपनी फतह की और दूसरी क़ुरआनी पेशीनगोई के सच साबित होने की।
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