कुरान - 40:55 सूरह ग़ाफ़िर अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

55
فَٱصۡبِرۡ إِنَّ وَعۡدَ ٱللَّهِ حَقّٞ وَٱسۡتَغۡفِرۡ لِذَنۢبِكَ وَسَبِّحۡ بِحَمۡدِ رَبِّكَ بِٱلۡعَشِيِّ وَٱلۡإِبۡكَٰرِ

Transliteration: (Fasbir inna wa'dal laahi haqqunw wastaghfir lizambika wa sabbih bihamdi Rabbika bil'ashiyyi wal ibkaar)

तो (ऐ प्यारे महबूब!) आप सब्र फ़रमाइए, बेशक अल्लाह का वा'दा सच्चा है [139], और अपने (ख़ास व उम्मत के) लोगों के लिए मग़फ़िरत तलब फ़रमाइए [140], और सुबह व शाम अपने रब की हम्द के साथ तस्बीह करते रहिए [141] । (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ग़ाफ़िर आयत 55 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ग़ाफ़िर (अल-मोमिन) तफ़सीर - आयत 55

"तो (ऐ प्यारे महबूब!) आप सब्र फ़रमाइए, बेशक अल्लाह का वा'दा सच्चा है [139], और अपने (ख़ास व उम्मत के) लोगों के लिए मग़फ़िरत तलब फ़रमाइए [140], और सुबह व शाम अपने रब की हम्द के साथ तस्बीह करते रहिए [141] ।"

[139] वा'दा-ए-इलाही की सच्चाई

हुज़ूर ﷺ को तसल्ली दी गई कि कुफ़्फ़ार की मुख़ालफ़त पर सब्र फ़रमाएं, अल्लाह का वा'दा-ए-नुसरत बिल्कुल सच्चा है और इस्लाम तमाम दीनों पर ग़ालिब होकर रहेगा।

[140] उम्मत के लिए हुज़ूर ﷺ का इस्तिग़फ़ार

हुज़ूर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम मासूम-अनिल-ख़ता हैं। आप अपनी उम्मत के गुनाहगारों की शफ़ाअत और बख़्शिश के लिए बारगाह-ए-इलाही में इस्तिग़फ़ार फ़रमाते हैं जो उम्मत के लिए रहमत-ए-अज़ीम है।

[141] सुबह व शाम हम्द व तस्बीह

सुबह व शाम अल्लाह की हम्द और नमाज़ों की पाबंदी हर मोमिन का शेवा होनी चाहिए।

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