कुरान - 20:40 सूरह ता-हा अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

40
إِذۡ تَمۡشِيٓ أُخۡتُكَ فَتَقُولُ هَلۡ أَدُلُّكُمۡ عَلَىٰ مَن يَكۡفُلُهُۥۖ فَرَجَعۡنَٰكَ إِلَىٰٓ أُمِّكَ كَيۡ تَقَرَّ عَيۡنُهَا وَلَا تَحۡزَنَۚ وَقَتَلۡتَ نَفۡسٗا فَنَجَّيۡنَٰكَ مِنَ ٱلۡغَمِّ وَفَتَنَّـٰكَ فُتُونٗاۚ فَلَبِثۡتَ سِنِينَ فِيٓ أَهۡلِ مَدۡيَنَ ثُمَّ جِئۡتَ عَلَىٰ قَدَرٖ يَٰمُوسَىٰ

Transliteration: (Iz tamsheee ukhtuka fataqoolu hal adullukum 'alaa mai yakfuluhoo faraja 'naaka ilaaa ummika kai taqarra 'ainuhaa wa laa tahzan; wa qatalta nafsan fanajjainaaka minal ghammi wa fatannaaka futoonaa; falabista sineena feee ahli Madyana summa ji'ta 'alaa qadariny yaa Moosa)

40. 'जब तुम्हारी बहन [39] चलती हुई आई, फिर उसने कहा, 'क्या मैं तुम्हें उस औरत का पता बताऊं जो इस बच्चे को दूध पिलाए [40] ?' फिर हमने तुम्हें तुम्हारी माँ की तरफ़ लौटा दिया ताकि उनकी आँखें ठंडी हों और वे ग़मगीन न हों [41]; और तुमने एक जान को मार डाला था, फिर हमने तुम्हें उस ग़म से नजात दी [42] और तुम्हें ख़ूब जांचा; फिर तुम मदयन वालों में कई साल ठहरे रहे [43], फिर ऐ मूसा! तुम मुक़र्ररा वक़्त पर (यहाँ) आ पहुंचे [44] ।' (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह ता-हा आयत 40 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

सूरह ता-हा — आयत 40 की तफ़सीर

" 'जब तुम्हारी बहन [39] चलती हुई आई, फिर उसने कहा, 'क्या मैं तुम्हें उस औरत का पता बताऊं जो इस बच्चे को दूध पिलाए [40] ?' फिर हमने तुम्हें तुम्हारी माँ की तरफ़ लौटा दिया ताकि उनकी आँखें ठंडी हों और वे ग़मगीन न हों [41]; और तुमने एक जान को मार डाला था, फिर हमने तुम्हें उस ग़म से नजात दी [42] और तुम्हें ख़ूब जांचा; फिर तुम मदयन वालों में कई साल ठहरे रहे [43], फिर ऐ मूसा! तुम मुक़र्ररा वक़्त पर (यहाँ) आ पहुंचे [44] ।' "

[39] हज़रत मूसा की हमशीरा (बहन)

हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) की बहन का नाम मरियम बिन्ते इमरान था। याद रहे कि हज़रत ईसा (अलैहिस्सलाम) की वालिदा माजिदा का नाम भी मरियम बिन्ते इमरान था, लेकिन वे दोनों इमरान अलग-अलग ज़माने के बुज़ुर्ग थे।

[40] माँ और बेटे का मिलाप: तदबीर-ए-इलाही

फ़िरऔन के महल में जब बच्चे के लिए धायों को बुलाया गया, तो हज़रत मूसा ने किसी भी दाई का दूध नहीं पिया। उस वक़्त बीबी मरियम ने कहा कि मैं एक ऐसी पाकबाज़ औरत को जानती हूँ जिसका दूध यह बच्चा क़बूल कर लेगा—और वह औरत हज़रत मूसा की हक़ीक़ी माँ (यूहाइज़) थीं। इस तरह अल्लाह ने माँ-बेटे को दोबारा मिला दिया।

[41] वालिदा का रंज दूर होना और इज़्ज़त के साथ रोज़ी

हज़रत मूसा की वालिदा ने न सिर्फ़ अपने जिगर के टुकड़े को कलेजे से लगाकर दूध पिलाया, बल्कि फ़िरऔन के शाही ख़ज़ाने से इज़्ज़त और उजरत भी हासिल की।

[42] क़िब्ती का क़त्ल और ग़म से ख़लासी

बारह साल की उम्र में हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) ने एक मज़लूम इस्राईली की मदद करते हुए मिस्री क़िब्ती को एक घूँसा मारा था जिससे वह इत्तेफ़ाक़न मर गया। फ़िरऔन के इन्तक़ाम के डर से वे मदयन तशरीफ़ ले गए, और अल्लाह ने उन्हें उस ग़म व ख़ौफ़ से महफ़ूज़ फ़रमाया।

[43] मदयन का क़ियाम

मिस्र से आठ मंज़िल दूर मदयन में हज़रत मूसा (अलैहिस्सलाम) आठ से दस साल मुक़ीम रहे, जहाँ हज़रत शुऐब (अलैहिस्सलाम) की साहिबज़ादी सय्यिदा सफ़ूरा से उनका निकाह हुआ।

[44] वादे के मुताबिक़ नबूवत का ज़हूर

मुक़र्ररा वक़्त से मुराद चालीस साल की उम्र है, जिस पर नबूवत का ताज़ अता किया गया—यह तक़दीर-ए-इलाही का वही अज़ीम वक़्त था जो रोज़े अज़ल से तय था।

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