कुरान - 7:205 सूरह अल-आराफ अनुवाद, लिप्यंतरण और तफसीर (तफ्सीर).

205
وَٱذۡكُر رَّبَّكَ فِي نَفۡسِكَ تَضَرُّعٗا وَخِيفَةٗ وَدُونَ ٱلۡجَهۡرِ مِنَ ٱلۡقَوۡلِ بِٱلۡغُدُوِّ وَٱلۡأٓصَالِ وَلَا تَكُن مِّنَ ٱلۡغَٰفِلِينَ

Transliteration: (Wazkur Rabbaka fee nafsika tadarru'anw wa kheefatanw wa doonal jahri minal qawli bilghuduwwi wal aasali wa laa takum minal ghaafileen)

और अपने रब को अपने भीतर याद करो, नम्रता और डर के साथ, और जुबान से कोई आवाज़ किए बिना [461] सुबह और शाम [462] , और लापरवाहों में से न बनो (अनुवाद — मुफ़्ती अहमद यार ख़ान)

मुफ़्ती अहमद यार ख़ान — सूरह अल-आराफ आयत 205 तफ़सीर



  • मुफ़्ती अहमद यार ख़ान (तफ़सीर-ए-नईमी)

📖 सूरा अल-आराफ़ – आयत 205 की तफ़्सीर

 

✅ [461] कुछ हालात में मौन ज़िक्र की प्राथमिकता

यह आयत अल्लाह का आंतरिक स्मरण बताती है, जिसमें नम्रता, भय और मौन शामिल हैं। यह सिखाती है कि कभी-कभी मौन ज़िक्र, ज़ोर से करने वाले ज़िक्र से श्रेष्ठ होता है, खासकर जब रियायत दिखाने का खतरा हो या यह दूसरों को परेशान कर सकता हो, जैसे कि पिछले आयत में कुरआन सुनते समय।
जहाँ ऐसा कोई व्यवधान न हो, वहाँ जोर से ज़िक्र करना भी प्रोत्साहित है, जैसा कि सूरा अल-बक़रा 2:199 में कहा गया है: अल्लाह को वैसे याद करो जैसे अपने पूर्वजों को याद किया करते थे।

✅ [462] सुबह और शाम का ज़िक्र

यह निर्देश सुबह और शाम में ज़िक्र करने के महत्व को भी उजागर करता है, खासकर फ़ज्र और अस्र के बाद, क्योंकि इन समयों में नैफ्ल (वोलंटरी) नमाज़ की अनुमति नहीं है।
ज़िक्र यह सुनिश्चित करता है कि विश्वासी का हर पल व्यर्थ न जाए, यह आध्यात्मिक जागरूकता बनाए रखता है और लापरवाही से बचाता है।

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